साधना अकेले बैठकर ही करनी पड़ती है, जन समुदाय के बीच तो मेला लगता है

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अ-अनार का, आ-आम का, इ-इमली की, ई-ईख की… बिल्कुल बच्चा जिस तरह से बारहखड़ी सीखता है आम लोगों के बीच, वैसे ही और उतना ही शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाया जा सकता है। बच्चे के अनार शब्द जान लेने का मतलब अनार एक लोकप्रिय फल हो गया ऐसा तो नहीं होता न….? प्ले-ग्रुप में जाने वाला हर बच्चा अनार से अपनी शब्द यात्रा शुरू करता है लेकिन वह अनार का दीवाना हो जाता हो, ऐसा तो नहीं न? बच्चे के अनार शब्द का अर्थ जान लेने का मतलब ‘अ’ जानना भर होता है। कुछ बड़ा होने पर वह अनार के रस, रूप, गंध को भी पहचानने लगता है लेकिन उसे अनार का पूर्ण ज्ञाता नहीं माना जाता और उसे ही क्यों, आप और मैं भी क्या अनार के पूर्ण ज्ञाता हैं? अनार का मौसम हमें पता होता है, पर अनार को कौन-सी मिट्टी ज़्यादा रास आती है, हममें से कम लोग बता पाते हैं, अनार का बाज़ार भाव और अनार का वैज्ञानिक पहलू समझना तो हममें से कइयों के बस की बात ही नहीं, हो सकता है मोटे-मोटे तौर पर हम अनार के गुणधर्म को जान लेते हों लेकिन तब भी हम अनार के ज्ञानी नहीं होते… तो जिसके बारे में हम अपने जीवन के दूसरे-तीसरे साल से जानते हैं उसे भी पूरा समझने के लिए हमें उम्र कम पड़ जाती हो तो शास्त्रीय नृत्य-संगीत में निष्णात होने में हम जल्दबाजी करना क्यों चाहते हैं, और हम क्यों चाहते हैं कि वह लोकप्रिय हो?

लोकप्रिय बनाने के लिए उसे सरल करना पड़ेगा, अनार को सरल कर देते हैं लेकिन फिर क्या वह अनार रहेगा, अनार और आम एक जैसे तो नहीं हो जाएँगे न, न इमली और ईख ही.. फिर शास्त्रीय संगीत से ही हमारी यह अपेक्षा क्यों हो भला? एक तर्क हमेशा दिया जाता है कि यदि इसे जन-जन तक पहुँचाया गया तो यह लोकप्रिय हो जाएगा जैसे पुराने हिंदी फिल्मी गीत जो शास्त्रीय संगीत के रागों पर आधारित थे, तब भी लोकप्रिय थे, या पुरानी फिल्मी नायिकाएँ जो किसी न किसी शास्त्रीय नृत्य में पारंगत हुआ करती थीं। कुछ हद तक इससे सहमत हो जाते हैं लेकिन तब भी उन गीतों या नृत्यों को शास्त्रीयता का दर्जा नहीं था, वे सुगम संगीत की श्रेणी में आते थे। तब भी फिल्मी गीतों को लगातार गुनगुनाया जाना भला नहीं समझा जाता था। इसे और भी सरल तरीके से समझते हैं कि जैसे अनार-आम या किसी भी फल-सब्जी के ठेले गली-गली दिख जाते हैं लेकिन उसे निर्मित करने वाला किसान सुदूर खेतों में अकेला होता है या उस पर वैज्ञानिक शोध करने वाला वैज्ञानिक भी कहीं अकेला अपनी प्रयोगशाला में तल्लीनता से उस पर कोई न कोई प्रयोग कर रहा होता है। मतलब नचनिया के ठुमके आपको गली-चौबारों पर देखने मिल सकते हैं लेकिन राज नर्तकी का मान किसी एक को ही मिलता था।

अकबर के नवरत्नों में एक सुप्रसिद्ध संगीत सम्राट तानसेन तो शहँशाह के लिए उपलब्ध था लेकिन बैजू बावरा तो ‘यथा नाम तथा गुण’ की तरह बावरा हो अपनी ही मस्ती में गाता था, वह सबके लिए कहाँ उपलब्ध था? और गुरु हरिदास, वे तो वन में ही अपने ध्येय से एकाकार होने के लिए गाया करते थे। तात्पर्य यह है कि शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाने या लोकप्रिय करने की चिंता हम क्यों करें? यदि हमारे लिए संगीत साधना है, तो साधना अकेले बैठकर ही करनी पड़ती है, जन समुदाय के बीच तो मेला लगता है और मेले में बजने वाले गीत वे ही होते हैं जो तुरत-फुरत में सबकी पसंद के हो जाए। दो मिनट में पक जाने वाले नूडल्स और सात्विक भाव से किसी वार-त्योहार को भगवान् के लिए तैयार किए जाने वाले 56 भोग को बनाने में समय तो लगता ही है और वह चाट-पकौड़ी की तरह चटपटा भी नहीं होता लेकिन उसका जो स्थान और महत्ता है वह अपनी जगह कायम है ही न। आप भगवान् को तो रेडी-टु-कुक का भोग नहीं लगाते न?

‘हिट एन रन’  की तरह आने वाला रोज का सोमवार-मंगलवार भी जब दीवाली का दिन बनकर आता है तो उस दिन का नाज़-नख़रा होता है। हम होली-दीवाली जैसे त्योहार में रमते हैं तब भी उसे 365 दिन लोकप्रिय कर देना नहीं चाहते। जिस दिन दीवाली होगी उस दिन आतिशबाजी होगी, जिस दिन होली होगी, उस दिन रंग जमेगा.. बाकी दिन तो हर आम दिनों की तरह काम होगा, भागमभाग होगी और तयशुदा रूटीन होगा। इस मर्म को समझ लिया जाए तो हम मानेंगे कि शास्त्रीय संगीत हमारे जीवन में वह है जैसे किसी वैज्ञानिक के लिए कोई महती शोध, जैसे भगवान् को लगाया जाने वाला भोग या जैसे दीपों का उत्सव, रंगों का त्योहार… जो आम नहीं, खास होता है, खास होता है इसलिए सरेआम नहीं, बहुत अलूफ होता है, जो भले ही सबके जीवन में न आएँ लेकिन जब आता है तो पुरसूकून दे जाता है।

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2 Comments

  1. अकेले भर की साधना हज़ारों को मंत्रमुग्ध करती हैं। बहुत सही व्याख्या।

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