ईमानदारी से पढ़ाई भी और संजीदगी से नृत्य भी

नई पीढ़ी करियर के लिए बहुत कुछ कर रही हो, लेकिन जीने के लिए नृत्य की ओर मुड़ी है।

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सीबीएसई द्वारा जारी १२ वीं के नतीजों में दो लड़कियों ने संयुक्त रूप से टॉप किया… एक है करिश्मा अरोड़ाऔर दूसरी है डीपीएस गाजियाबाद की हंसिका शुक्ला। इस ख़बर में एक और ख़बर है… शायद उस ओर ध्यान देना ज़्यादा ज़रूरी है, क्योंकि सीबीएसई के 12वीं के नतीजों में ज्वॉइंट टॉपर जिस करिश्मा अरोड़ा को 12वीं में 500 में से 499 अंक मिले हैं वह बीते सात सालों से बहुत गंभीरता से कथक सीख रही है। रेखांकित करने वाली बात यह है कि कथक सीखते हुए भी उसके अकादमिक अंक ज़रा भी कम नहीं हुए हैं। केवल अर्थशास्त्र में उसे 99 अंक आए बाकी अन्य चारों विषयों (अंग्रेजी, फाइन आर्ट, साइकोलॉजी और होम साइंस) में उसे 100 में से 100 अंक मिले हैं।

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की रहने वाली करिश्मा की बड़ी बहन भूमिका ने भी सीबीएसई में मुजफ्फरनगर जिला टॉप किया था, अब वह कॉलेज में है। मतलब साफ है कि कथक (या अन्य संगीत विधा ही) आपकी पढ़ाई को प्रभावित नहीं करता… आगे इसी लेख में हम आपको इसी तरह की अन्य युवतियों से मिलवाएँगे जो बहुत ही पढ़ाकू किस्म की है और उतनी ही संजीदगी से कथक कर रही है। तभी तो उसकी सफलता से जहाँ उसकी कथक गुरु विधा लाल और गीतांजलि लाल को प्रसन्नता हुई वहीं स्कूल की प्रधानाचार्य चंचल सक्सेना ने गले लगा लिया था।

गुरु गीतांजलि लाल

…तो सीबीएसई में ऑल इंडिया रैंक में पहला स्थान प्राप्त करने वाली मुजफ्फरनगर की एसडी पब्लिक स्कूल की छात्रा करिश्मा अरोड़ा डांस थैरेपिस्ट बनना चाहती हैं। करिश्मा से बात करने पर उसने कहा बीते सात सालों से वह हर रविवार मुजफ्फरनगर से तीन घंटे की यात्रा कर दिल्ली पहुँचती है और जहाँ वह जयपुर घराने की प्रकांड विद्वान गुरु गीतांजलि लाल से कथक की शिक्षा प्राप्त करती है और फिर उतनी ही लंबी यात्रा कर घर लौटती है। सप्ताह के दिनों में वह घर पर रोजाना रियाज़ करती है इसके साथ 20 घंटे नियमित पढ़ाई भी करती आ रही है। कथक के प्रति उसकी लगन ने उसे वर्ष 2014 से भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से छात्रवृत्ति भी दिलवाई है।

करिश्मा बताती है उसके पिता मनोज जैविक खाद बनाने के बिजनेस से जुड़े हैं और वे उसे इन सभी सालों में कथक सिखाने के लिए ले जाते रहे हैं। न तो पिता ने, न माँ मोनिका ने उस पर पढ़ाई का कभी दबाव डाला। बच्चों पर विश्वास और उनके कला गुणों को प्रोत्साहित करना क्रांतिकारी कदम की तरह है। अन्यथा घर-परिवार, समाज द्वारा दसवीं-बारहवीं की पढ़ाई पर इस तरह ज़ोर दिया जाता है मानो इसके अलावा और कुछ है ही नहीं।

बाएं से – करिश्मा की माँ श्रीमती मोनिका अरोड़ा, श्रीमती चंचल सक्सेना (प्रधानाचार्य-एसडी पब्लिक स्कूल), डॉ नूतन जैन तथा करिश्मा के पिता श्री मनोज कुमार अरोड़ा

करिश्मा ने दसवीं की परीक्षा मुजफ्फरनगर के ही होली एंजल स्कूल से दी थी तब भी उसका 10 सीजीपीए आया था। मतलब कथक सीखते हुए न तो उसकी पढ़ाई में व्यवधान आया न पढ़ाई ने उसे कथक करने से रोका।

करिश्मा उस पीढ़ी का भी नेतृत्व कर रही है जो इस मिथ को तोड़ रही है कि कला को जीवन बनाने वाले पढ़ाई में कमज़ोर होते हैं इसलिए कलाकार बन जाते हैं।

ह्यूमैनिटीज़ स्ट्रीम में टॉप करने वाली करिश्मा ने एक स्कूल भी जॉइन किया है जहाँ वह बधिर और मेंटली चैलेंज्ड बच्चों से कम्युनिकेशन करना सीख रही हैं। उसने दिव्यांग बच्चों को कथक सिखाना शुरू किया है। करिश्मा ने बताया कि वह साइकोलॉजिस्ट बनना चाहती हैं। पहले पहल वह भरतनाट्यम सीखती थी फिर कक्षा 6 में आने पर उसे समझ आई और उसे लगा कि कथक ही उसका ध्येय है। कथक उसे मानसिक शांति और सुकून देता है।

करिश्मा से कुछ वरिष्ठ कह सकते हैं रसिका भावे। गत वर्ष कॉउसलिंग साइकोलॉजी (पुणे) में एम.ए. करने के बाद अब वह काउंसलर और डांस थेरेपिस्ट के रूप में रिहेबलिटेशन सेंटर में कार्य कर रही है। यूनेस्को से उसने नृत्य (डांस) थेरेपी पूरी की है। करिश्मा और रसिका के बीच इस तरह की समानता उससे बात करने के लिए प्रेरित करती है। रसिका बताती है केवल वह ही नहीं, उसकी नृत्य कक्षा में आने वाली अन्य कुछ युवतियाँ भी हैं जो संजीदगी से नृत्य कर रही है और ईमानदारी से पढ़ाई। क्या है जो इन्हें नृत्य से जोड़ता है? रसिका कहती है गुरु का साथ। रसिका, शलाका, ऐश्वर्या और प्रियंका उस पीढ़ी की है जो पढ़ाई को पढ़ाई की तरह ही कर रही हैं और कथक भी कर रही हैं। वे कहती हैं गुरुवर्य सोनाली चक्रवर्ती से हमें इसकी प्रेरणा मिलती है। कथक में करियर बनाने से अधिक प्रिय हमारे लिए कथक करना है। अपने गुरु के यहाँ वे कोई परीक्षा नहीं देती, कथक सीख रही है क्योंकि उन्हें कथक ही करना है।

रसिका बीते आठ सालों से कथक सीख रही है। इसके लिए वह हर हफ्ते दो-ढाई घंटे की यात्रा करती है। गुरु को मंच पर गतभाव (माखन चोरी) करते देख बचपन में कथक सीखने की हूक जगी, जो अनवरत साधना में बदल गई। कथक उसे जिंदा रहने की ताकत देता है।

शलाका करंदीकर एमबीए करने की तैयारी में है। सुबह गुरु के यहाँ समय पर रियाज़ के लिए पहुँचना, फिर नौकरी-पढ़ाई के लिए भागना, लेकिन उसके अनुसार इस भाग-दौड़ की ताकत कथक सीखने के दौरान जो अनुशासन की आदत लग जाती है, उसी से मिलती है।

दस सालों से कथक सीख रही प्रियंका कारे बीई (इलेक्ट्रॉनिक्स) है और अभी इंटर्नशिप कर रही है। वह कहती है गुरु की कृपा से मैं समझ पाई हूँ कि अपनी संस्कृति को समझना है तो अपने देश की कलाओं को समझना होगा। कथक सीखने के लिए मुझे हफ्ते में दो से तीन बार लंबी यात्रा कर जाना पड़ता है लेकिन उसके बदले जो भव्यता, वैचारिक प्रखरता और वैज्ञानिक सोच मुझे हासिल होती है, उसकी तुलना नहीं की जा सकती।

ऐश्वर्या लंके नागपुर से औरंगाबाद होते हुए पुणे पहुँची है। वह बताती है आम मध्यम वर्गीय परिवार में वह पली-बढ़ी है, जहाँ अच्छे अंक प्राप्त करने पर पुरस्कृत किया जाता है। सात साल की थी तो मैंने भरतनाट्यम सीखना शुरू किया। करिश्मा की तरह ऐश्वर्या ने भी छठी कक्षा में मंच पर कथक प्रस्तुति देखी तो मन कथक सीखने का बना लिया। कुछ साल स्कूल और कथक जारी रहा। दसवीं के बाद आईआईटी की कोचिंग आदि में समय बीतता गया। वह कहती है, पुणे में इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष के दौरान, मैंने गुरु सोनाली चक्रवर्ती के मार्गदर्शन में कथक सीखना शुरू किया और तब से सीख रही हूँ। वर्तमान में मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में पर्सिस्टेंट सिस्टम्स, पुणे में काम कर रही हूँ। कथक का सागर इतना विशाल है कि उसकी अगाध सीमा मुझे खींचती है। कथक सीखना अद्भुत अनुभव है और इस कारण मैं इसे कभी नहीं छोड़ सकती। छोटे से छोटे टुकड़े के लिए बहुत अभ्यास किया जाता है (जैसे कि बोल, हस्तक या कवित्त) और फिर उसे करते हुए जो भीतरी शांति मिलती है उसे कह नहीं सकते। मैं कथक में नई चीजें सीखने के लिए उत्साहित रहती हूँ। मुझे सिखाया गया सबसे बड़ा सबक यह था कि कथक वास्तविकता के करीब है जितना हम इसे समझते जाते हैं, हमें लगता है, हम जीने लगे हैं। हम जो भी छोटी-छोटी चीजें करते हैं, हाथों, भावों और शरीर का उपयोग करते हुए व्यक्त करते हैं, यह उसी तरह होना चाहिए जैसे वास्तव में हुआ हो। नई चीज़ें तलाश करना, कथक की बारीकियों को समझने की कोशिश करना शानदार अनुभव होता है। मैं खुद इंजीनियर होने के नाते, मुझे किसी भी तकनीक की छोटी-छोटी बातों को समझने का शौक है। जब मैं एकाग्रता में कुछ पढ़ने की कोशिश करती हूँ, या कोडिंग समस्या को हल करने की बहुत कोशिश करती हूँ। तो मुझे ऐसे क्षण कथक में भी पसंद आते हैं। कथक मेरे जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है। इसका अभ्यास करते समय मुझे जो कुछ भी मिलता है, वह मुझे कहीं और नहीं मिलता।

… तो यह वह नई पीढ़ी है जो करियर के लिए बहुत कुछ कर रही हो, लेकिन जीने के लिए नृत्य की ओर मुड़ी है। इस नई पीढ़ी से उम्मीदें भी इसलिए है क्योंकि यह मेहनत से नहीं कतराती, जब आप इन्हें कथक करते हुए देखते हैं तो आप कथक क्षेत्र में आशा की नई किरणों को देखते हैं और फिर उनके नाम चिन्मयी-जान्हवी रहाणे हो या साराक्षी पुराणिक, लेकिन उनसे कथक का परवान चढ़ता प्रतीत होता है।

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  1. बहुत बहुत धन्यवाद सुधाजी…मेहनत तो उन लोगों की ही है…मैंने तो केवल शब्दबद्ध किया है…

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