रसराज पंडित जसराज

July 26, 2018
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Rasraj Pandit Jasraj
Author/Artiste:
Publisher:
Published: July, 2018
Format: Hard Bound & Paper Back
Edition: First

पंडित जसराज इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूज़िक, अमेरिका के 2017 के सत्र में पंडित जी के वरिष्ठ छात्रों में से श्री मुकेश देसाई जी भी कुछ सत्र ले रहे हैं। मुकेश जी को भी रत्तन जी, तृप्ति जी आदि की तरह गुरु की उपाधि दी गयी है। गुरु मुकेश देसाई! मुकेश जी भी अनेक वर्षों से पेन्सिलवेनिया में संगीत का अध्ययन-अध्यापन करते हैं। लेकिन शिविर में वो पहले पंडित जसराज के शिष्य हैं और बाद में अपने छात्रों के गुरु। अपने गुरुजी के सम्बन्ध में वह कहते हैं—'कौन जाने वो किस राह गुज़र से गुजरें। हर गुज़र राह को फूलों से सजाए रखिये।‘ गुरु न जाने किस मार्ग से ईश्वर के दूत बनकर आ जाएँ, इसलिए प्रत्येक मार्ग को फूलों से सुसज्जित करके रखें।

'अपने-अपने म्यूज़िक कॉलेज से जो सरगम, बन्दिश, तान आदि सीखकर सब आते हैं, यहाँ की शिक्षा वह संगीत विशारद आदि जैसी शिक्षा नहीं है, बल्कि उसके बाद की शिक्षा है, जिसे जीवन में उतारना पड़ता है। इन सबके बाद जो सीखना होता है, वह अलग ही कुछ चीज़ है। यह गायकी का मन्दिर है, गायकी का धाम है, गायकी का गुरुकुल है। इस मन्दिर में ऐसी बहुत-सी चीज़ें होती हैं जिन्हें अपने गले से निकालकर लगता है कि हमसे तो ठीक गाना ही नहीं हुआ। लेकिन रात को घर जाकर उन सुरों को अपने भीतर उतारें, उन्हें गुनगुनाएँ तो अगले दिन वह सहज ही अपने गले से उतरने लगती है। रात को वह नींद में सुनायी पड़ती है, रोम-रोम में समा जाती है।’

पंडित जसराज के अधिकांश शिष्यों को यह लगता है कि गुरुजी इनसे हमेशा सौ क़दम आगे ही चलते हैं। 'सौ क़दम तो मैं केवल बोलने के लिए बोल रहा हूँ। यूँ तो असंख्य क़दम का फासला है उनके और हमारे बीच। गुरुजी का 'सा’ और हमारा 'सा’, दोनों में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। उनका 'रे’ लगा, 'गांधार’ लगा, कल शाम क्या 'मल्हार’ गाया कि रात भर पानी बरसता रहा। ये तो स्वरों का कमाल है। उस तरह की गायकी गुरु की अलग ही होती है। उसे अपने में उतारना है तो प्रयास तो हमें ही करना पड़ेगा। प्यासे को ही कुएँ के पास जाना पड़ेगा।‘

मुकेश जी अपने अनुभवों को छात्रों के साथ बाँटते हैं-'हम जब मुम्बई में गुरुजी के पास गाना सीखते थे तब कहीं वाह-वाह नहीं होती थी, न तो घर में और न ही स्टेज पर। हमेशा सजग रहना पड़ता था। ऐसा कभी नहीं हुआ कि बैठे हैं और मज़ा आ रहा है। कि वाह, क्या समां बाँधा है, वो भी गा रहे हैं, हम भी गा रहे हैं न, वो ऊर्जा ही अलग होती है, जब हम गुरुजी से सीखते हैं। यह वह ऊर्जा है जो प्रतीक्षा नहीं कर सकती। इस मन्दिर में माथा टेकने के बाद, सीखने के बाद, आप जहाँ भी जायेंगे, सारे कपाट अपने आप खुलते जायेंगे। यह सीखना किसी भी साधारण कक्षा में सीखने से कहीं अलग है। आप बड़े गुरुजी, तृप्ति जी, राधारमण जी, रत्तन जी के सम्मुख बैठकर उनकी ऊर्जा को ग्रहण करने का प्रयास कीजिए, तो पता चलेगा कि गुरु का माने क्या होता है। गुरु का मिलना कितना कठिन है। सन्त कबीर ने लिखा है—'बड़ा विकट यम घाट। गुरु बिन कौन बताये बाट।‘ यह प्रश्न इतना विकट है कि आप कभी भी गुरु के सामने सहज भाव से नहीं बैठ सकते। यूँ भी मन में विचारों का ताँता लगा रहता है। जब हम स्वस्थ नहीं होते और ग़लती करने पर गुरु से डाँट पड़ती है तो हमें लगने लगता है कि गुरुजी क्या जानें, हम तो ठीक कर रहे हैं, हमें गुरु बदल लेना चाहिए। लेकिन संगीत सरल नहीं है। यह सृजन की प्रक्रिया है। इसमें अपने आपको और अपनी आवाज़ को सँभालना है। आज ये खा लिया तो आवाज नहीं चलेगी। कल बारिश हो गयी तो आवाज नहीं लगेगी। जाने कितने-कितने आशीर्वाद चाहिए। ये जो ऊर्जा-चक्र है, इनमें हमारे सारे अनुभव जमा होते रहते हैं। इनके कारण आवाज़ बदलती रहती है। गाने में सोच-विचार नहीं लगाना। भली-भाँति साधना करके सहज भाव से गाना है। यह तर्क की बात नहीं है। जहाँ तर्क लगाया, ग़लती होगी ही होगी।

पंडित जसराज के साथ रहकर उनके शिष्यों ने यह सीखा कि संगीत को हृदय से महसूस किया जाता है, हृदय से गाया जाता है और हृदय से सुना जाता है।

मंच पर पंडित जी के साथ उनके पीछे गाना भी एक परीक्षा होती है। मंच पर दो शिष्य हैं, या चार शिष्य हैं, सारे एक साथ गायें या सभी में इतना तालमेल हो, यह भी किसी चमत्कार से कम नहीं, क्योंकि कभी लगता है कि साँस जैसे एक जगह पर है, अभी जैसे उस जगह वह स्वर रुकेगा। यह एक इशारा है जिसे शिष्य समझते हैं। पंडित जसराज के सभी शिष्यों को मालूम है कि ऐसे समय में क्या करना है। श्रोताओं के सामने तो सीधे-सीधे कह नहीं सकते कि 'सा’ नीचे लगा है। लेकिन गुरु-शिष्यों के बीच अपने संकेत होते हैं जिससे ऐसी स्थिति में शिष्यों को कहा जाता है कि अब आगे क्या करना है। मंच पर जो चलता रहता है वह अपने-आप में एक पूरा का पूरा संसार है।

मैंने पंडित जी को बहुत सारे तबला वादकों के साथ सुना है। उनका तबला वादक लयकारी या संगीत में बहुत तेज़ होगा तो भी, नहीं होगा तो भी, उसके साथ तालमेल बिठाकर कैसे गाने को उठाना है कि बैलेंस बना रहे और तबला गाने पर हावी न हो, पंडित जसराज बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। यही बात पंडित शिवकुमार शर्मा पंडित जसराज के बारे में बताते हैं। संगतिकारों के साथ एकदम सुन्दर तालमेल बनाकर चलना, यह जसराज जी की बहुत बड़ी खूबी है।

'छात्र के रूप में इतने बड़े कलाकार को शुरू से सुनना, तंबूरा मिलाने से लेकर कंसर्ट के समापन तक, यह बहुत बड़ी भाग्य की बात है। शिष्यों को अपने जीवनकाल में देखने, सुनने और अनुभव करने को मिलता है।‘ मुकेश देसाई कहते हैं—'यहाँ अमेरिका में भी बहुत कंसर्ट होते हैं, मुम्बई में भी, दूसरे शहरों में भी। तो जो शिष्य उनके साथ होते हैं, उन्हें कितना बड़ा अवसर मिलता है सीखने का। मंच से भी वो हमें कितना-कितना सिखाते हैं। कभी-कभी वो ऐसी जगह खो जाते कि सुनने में लगता कि वाह क्या बात है! सिखाने में भी कोई-कोई जगह ऐसी आती है कि महसूस होता है कि कितना अच्छा गाना हो रहा है। ऐसे में उस खूबसूरत लम्हे में से बाहर निकलना कठिन हो सकता है। वैसे भी गुरुदेव शिष्यों से एक हज़ार मील आगे चलते हैं। जब शिष्य अटक जाता है तब उन्हें ही लौटकर आना पड़ता है। शिष्य के धरातल पर पाँच सौ-हज़ार मील पीछे, तालमेल बिठाने के लिए। और फिर एक-एक शिष्य के साथ उसकी खूबियों और कमजोरियों पर समय व्यतीत करना, कहाँ सहज है? गुरुजी का हमेशा यह प्रयास रहता है कि उनके जिस भी शिष्य ने संगीत को अपनी जीवन-साधना के रूप में चुना है, उसे समुचित आय होनी चाहिए ताकि वह अपना तथा अपने परिवार का भरण-पोषण सुचारु रूप से कर सके।’

मुकेश देसाई जब अपनी शिक्षा को बड़ौदा म्यूज़िक कॉलेज से समाप्त करके मुम्बई पंडित जसराज के पास पहुँचे तो उन्होंने पूछा, कि तुम संगीत आगे क्यों सीखना चाहते हो? तब मुकेश जी ने भी सीधा-सीधा उत्तर दिया था—'संगीत मेरे लिए आध्यात्मिक तो है ही, रोज़ी-रोटी कमाने का साधन भी है। यदि मुझे आप अपने शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे तो मैं किसी और के पास जाऊँगा, लेकिन मुझे संगीत तो सीखना ही है। पर संगीत मुझे कमाने के लिए सीखना है। यह संगीत के आध्यात्मिक पक्ष के अलावा मुख्य कारण है। तब इन्होंने अपना तंबूरा मेरी ओर जरा खिसका दिया और बोले कि इसको जरा मिलाओ। मैंने सोचा था कि कहेंगे थोड़ा गा के सुनाओ। लेकिन उन्होंने तंबूरा मिलाने को कहा। तो मैंने तंबूरा मिलाया। पहले ही दिन मुझसे तंबूरा ट्यून करवाया। उसके बाद उन्होंने पूछा कि क्या गाओगे? मैंने कहा कि पूरिया गाऊँगा। उन्होंने कहा—वाह, गाओ। तो इस तरह हमारी यात्रा शुरू हुई। कभी-कभी मैं गाना सीखने सुबह-सुबह घर से सांताक्रूज से निकलता। खार से बस में चढ़ा। मुम्बई में बस में तो खड़े होकर ही जाना पड़ता था। बैठने के लिए सीट मिलने का सवाल ही नहीं था। इनके पास पहुँचे और इन्होंने कह दिया कि अच्छा ऐसा करो कि तुम और ये मुरली या जो भी वहाँ रहा हो, बॉम्बे सेंट्रल जाओ और विदिशा की एक टिकट लेकर आओ। मैं चिट्ठी लिखकर देता हूँ। रेलवे के ऑफ़िसर से मिलना और मेरे लिए एक टिकट कटवा लेना। बॉम्बे सेंट्रल में ऑफ़िसर से वो ऑफ़िसर लिखा-पढ़ी करवा दे तो फिर चर्चगेट जाएँ टिकट निकलवाने के लिए। टिकट लेकर वापस आये तो गुरुजी बोले—अरे यार, तुम्हारे जाने के बाद एक और कमिटमेंट आ गया। अब ऐसा करो कि टिकट कैंसल करा आओ। और हम सोच रहे हैं कि अरे, सुबह से निकले हुए हैं, वापस उधर ही जाना है, और दुबारा लौटकर आना है। हम आज समझ सकते हैं कि ये ऐसा क्यों कर रहे थे। हमारा एक टेस्ट साथ-साथ चल रहा था कि हममें बर्दाश्त करने का कितना दम है। इनकी कोशिश यही है कि तुम भाग जाओ, यह लाइन बहुत कठिन है। यह देखना बहुत ज़रूरी है कि तुम टिक पाओगे या नहीं। घरानों में यह टिकने वाली बात है। यह नहीं कि अभी ये कर रहे हैं, अभी वो। नहीं, यह वो मन्दिर नहीं है जहाँ भगवान् आपको छोड़ दें।‘ शिष्यों के धैर्य परीक्षण के अतिरिक्त पंडित जसराज के मस्तिष्क में एक और बात कौंधती रहती थी हरदम। वह यह कि किसी तरह उनके जीवनयापन का भी हिसाब-किताब चलता रहे। कभी शान्ताबाई सोमाणी या ऐसे ही कुछ और लोगों के यहाँ ट्यूशन दिलवा देते। कभी एच.एम.वी. में भेज देते कि वहाँ कुछ काम करके आओ। इसी सब में पूरा दिन निकल जाता, लेकिन सम्भवत: यह परीक्षा पंडित जसराज के शिष्यों के लिए आवश्यक थी कि उनमें टिके रहने की शक्ति है या नहीं।

मुकेश देसाई की माँ जब उन्हें पंडित जसराज के पास पहली बार लेकर आयी थीं तो उन्होंने पूछा था कि मुकेश को आपके पास कितने साल रहना पड़ेगा? उन्होंने सोचा था कि शायद पाँच साल के लिए कहेंगे। लेकिन पंडित जसराज ने बिना पलक झपकाये कहा—बीस साल। बीस साल? वो मुकेश के पिता की ओर देखने लगीं तो वो बोले कि बीस साल तो होता ही है। वो दोनों भी सांगीतिक परिवारों से थे, इसलिए यह समझ पाये कि शिक्षा पाने के लिए बीस वर्ष का समय तो लग ही सकता है, तभी लड़का कुछ ठीक-ठाक सीख पाएगा। लेकिन यहाँ भी मुकेश की परीक्षा चल रही थी कि वह अपना धीरज खो दें और कहें कि मुझे यहाँ नहीं सीखना है। टिकट तो फ़ोन से भी हो जाती है और वहीं से एक आदमी भिजवाते, लेकिन शिष्यों को इतनी दूर नहीं भेजना। यह हर समय का परीक्षण था कि पहले अपने-आप को मज़बूत बना लो, तब संगीत-साधना कर पाओगे।

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