मुस्कुराती हुई एक आवाज़ : बेगम परवीन सुल्ताना

‘उस गैरत-ए-नाहीद की हर तान है दीपक, शोला सा लपक जाए है आवाज़ तो देखो’

बेहद मशहूर शायर मोमिन ख़ाँ ‘मोमिन’ के ये लफ्ज़ वैसे तो पटियाला घराने की सबसे मज़बूत गायिका पद्मभूषण बेगम परवीन सुल्ताना के जन्म से पहले लिखे गए पर शर्तिया ये उनकी आवाज़ और गायकी को बेहद खूबसूरती से बयाँ करते हैं! जब गले में कुदरत ने अपने रंग भरे हों, रियाज़, समर्पण और लगन ने उसपर धार चढ़ाई हो तो क्या ही हैरत कि बेगम जैसी आवाज़ हमारे बीच गूँज रही है!

नौगाँव(आसाम) के किसी घर में छः बरस की एक बच्ची अपने अब्बा का रियाज़ सुनकर कुछ गुनगुना उठी और अब्बा ने जान लिया उनके घर कुदरत का एक अनोखा करिश्मा जन्मा है जिसकी आवाज़ इतनी कम उम्र में भी तीसरे सप्तक के गंधार को छू रही थी, पता नहीं कितने रियाज़ चाहिए होते  हैं इस स्वर को छूने, इसपर ठहरने के लिए! अब्बा उस बच्ची का हाथ पकड़कर आसाम से कलकत्ता चले आए और पंडित चिन्मय लाहिडी के हवाले कर दिया। उन दिनों मुसलमान लड़कियों का गाना सीखना इतनी आसान बात नहीं रही होगी, पर पंडित जी भाँप गए कि उनके सामने बैठी बच्ची बिन तराशा नायाब हीरा है। पंडित जी खुद आठ गुरुओं की संगत कर चुके थे पर वे ग्वालियर घराने के ज़्यादा करीब थे और बेगम अपने पिता (जो पटियाला घराने से थे) से सीख चुकी थीं, शुरू से ही मुख्तलिफ घरानों की खूबसूरती समझ पाईं। बहरहाल अपने स्वास्थ्य की वजह से पंडितजी लंबे समय तक बेगम को नहीं सीखा पाए पर तालीम की बुलंद नीव पड़ चुकी थी, जिसपर नक्काशीदार मंज़िलें, महले दोमह्ले बनने अभी बाकी थे। उन्होने बेगम को उस्ताद दिलशाद ख़ान के हवाले किया ।

उस्ताद दिलशाद ख़ान बेगम की ज़िंदगी उस्ताद की हैसियत से आए जो बाद में उनके हमराह भी बने। दिलशाद ख़ान किराना घराने से हैं जिसकी गायकी पटियाला घराने से थोड़ी अलग होती है और बेगम पटियाला घराने की, यह शायद उन उदाहरणों में से एक है जिसमें गुरु ने शिष्य का घराना बदलने की कोशिश नहीं की और शिष्य ने भी गुरु के घराने की खूबसूरत बातें अपनी गायकी में उतार लीं। हालाँकि घरानों की जिरह में अक्सर छोटी मोटी ख़ुशगवार किस्म की नोंक झोंक ख़ान साहब और बेगम के बीच आज भी होती रहती है, पर कलाकार ऐसे ही होते हैं, प्यारे और मीठे ! पटियाला घराने में आकार को अधिक महत्व दिया जाता है, मुरकी, खटका और ज़मज़मा काफ़ी महत्वपूर्ण होते हैं, वक्र और फिरत तानों, गमक और ख़याल गायकी में मींड़ और बोल भाव पटियाला घराने की ख़ासियत हैं। वैसे सा की साधना तो हर घराने में ज़रूरी समझी जाती है, पर बेगम इसे कुछ यूँ बयान करती हैं – “सा लगाना जैसे हाथी को अपने काँधे पे उठाना, नाभि से आनी चाहिए आवाज़, और जब आप कुछ समय ये रियाज़ कर लेते हैं तो फिर निखरती है आवाज़ जो हर स्वर् को उसके मायने देती चलती  है।” वे कहती हैं – “मैं नहीं जानती मैं कैसे गाती हूँ, मेरी आत्मा गाती है, राग मुझे इशारा करते है कि हमें इस तरह गाओ।” कितना आत्मसात किया हैं रागों को उन्होने, इस एक बात से जाहिर हो जाता है।अपनी गायकी के बारे वे कहती हैं – “मैं धीरे से सुर लगाती हूँ और कल्पना करती हूँ एक कैनवास है मेरे सामने और, राग के नियमों को ध्यान में रखते हुए जिसमें मुझे सुरों से रंग भरने हैं, और मैं वह करती जाती हूँ, सुरों को फिर खुला छोड़ देती हूँ, सुरों को बाँधना उड़ती चिड़िया को पिंजरे में क़ैद करने जैसा है।” ये अल्फ़ाज़ हमें बताते हैं , संगीत का व्याकरण जब क़ब्ज़े में हो और आत्मा में संगीत कूट कूटकर भरा हो तो फिर कैसी कलाकारी, कैसा हुनर कैसा फनकार बनता है!

बेगम घरानों की आपसी रंजिश (जो अब पहले से काफ़ी कम है) को भूलकर अपने संगीत में सभी घरानों की ख़ासियत पिरोने की पैरोकार हैं, उनका कहना है हमें सारी अच्छी चीज़ें अपनी गायकी में लेनी चाहिए।सबसे खूबसूरत बात वे जानती हैं नई पौध को संगीत की तरफ कैसे लाना है और बड़े ही दिलकश अंदाज़ में कहती हैं “पहले आप चिड़िया को थोड़ा दाना दीजिए (उन्हें हल्की फुल्की गायकी से परिचित कीजिए, अपनी तरफ आकर्षित कीजिए) एक बार चिड़िया दाना चुगने लगे तो पकड़कर उसे गंभीर शास्त्रीय संगीत के पिंज़ड़े में बंद कर दीजिए!”

वे सुननेवालों की नब्ज़ पहचानती हैं जो किसी भी कलाकार की काबिलियत होती है। वे उनमें से नहीं जो शास्त्रीयता के दंभ में उन्हें बिसार देते हैं जिन्हें शास्त्रीय संगीत की समझ नही। फिल्म संगीत का कोई ख़ास शौक नहीं बेगम को पर उनका गाया ‘हमें तुमसे प्यार कितना’ आज भी पता नहीं कितने लोगों के दिलों पर राज़ कर रहा है। गौरतलब बात, पंचम दा ने उन्हें उस गाने का सिर्फ़ एक खाका सौंपा था, बेगम को पूरी आज़ादी दी थी उसे अपने तरीके से गाने की और बेगम ने फिर वह न भूलने वाली मिश्र भैरवी की ठुमरी गाई जो एक टेक में ही रेकॉर्ड की गई। बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि १५ बरस की उम्र में बेगम ने पाकीज़ा फिल्म की वह मशहूर ठुमरी गाई थी – ‘कौन गली गयो श्याम’। इतनी कच्ची उम्र में नौशाद उनकी पक्की गायकी देखकर दंग रह गए थे।

बेगम का गाया गाया राग भैरवी में भवानी दयानी महवाकवानी’ शायद सबसे बेहतर गाया हुआ भजन है। कैसे संगीत मज़हब की सीमाओं से ऊपर ले जाता है, यह भजन और बेगम उसकी मिसाल हैं। राग अहिर भैरव और ललित की उनकी गायकी निशब्द कर देती है।

इन अल्फाज़ों को काग़ज़ के पन्नों के हवाले करते समय नैपथ्य से उठती एक मीठी रेशमी ज़रीदार और मांसल आवाज़ अपनी ओर बुला रही है, स्वर रच रहे हैं ऐसा वातावरण जहाँ निर्वात को भरती हुई सुरों की नक्काशियाँ हैं, अदृश्य स्वरों का स्वरों से जुड़ाव है और असीमित आनंद है! बेगम की गायकी को शब्दों में पिरो पाना इतना भी आसान नही बस समझिए – ‘खुदा की उस गले में अजीब कुदरत है, वो बोलता है तो एक रोशनी सी होती है….’

ऊपर वाला ये कुदरत ये हुनर बरकरार रखे, दुनिया थोड़ी और खूबसूरत थोड़ी और सुरीली बनी रहेगी !

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