पंडित जी का गाना और उस्ताद जी का बजाना

पंडित और उस्ताद जैसी पदवियां क्या स्वयं को दी जाती है? क्या आज के इस युग में नन्हें उस्ताद जैसी उपमाएं लगाना ठीक है?

भारतीय शास्त्रीय संगीत सुरों का ऐसा सागर है जिसकी गहराई को नापने के लिए वर्षों की तपस्या भी कम है। अपने आप को रियाज की आग में तपाकर कुंदन बनाने के लिए मेहनत और जज्बे के साथ लगन का साथ लेना पड़ता है तब जाकर सौ प्रतिशत की गई रियाज का दस प्रतिशत मंच पर से प्रदर्शित हो पाता है। इतना होने के बाद भी ईश्वर कृपा हो तभी आप महफिल के राजा कहला सकते है क्योंकि यह जरुरी नहीं की आप जितनी बेहतरीन रियाज घर पर करते है वैसा ही आप मंच पर प्रस्तुत करे।

संगीत तो गुरुमुखी विद्या है, और वर्षों की मेहनत करते समय और गुरु को मंच पर से प्रदर्शन देते देखना और मन में यह प्रश्न उठना की मैं कब इस तरह का प्रदर्शन दे पाऊंगा, स्वाभाविक है और यह बात संगीत या नृत्य सीख रहे प्रत्येक शिष्य के मन में आना लाजमी है। यहीं से फैंटेसी वर्ल्ड आरंभ होता है भारतीय शास्त्रीय संगीत का, जिसमें पंडित और उस्ताद पदवियों को लेकर हरेक कलाकार के मन में लड़्डू फूटते है।

दरअसल यह प्रश्न बडा सामान्य सा है कि आखिर कौन पंडित है और कौन उस्ताद। संगीत के सुर भले ही सच्चे हो धर्म और पंथनिरपेक्ष हो पर हम लोगो ने हिंदू कलाकार है तो पंडित और मुस्लिम कलाकार है तो उस्ताद लगा ही दिया है। यह टैगिंग क्यों की गई यह पता नहीं है पर परंपरा चली आ रही है और आश्चर्य का विषय है कि कलाओं के अन्य माध्यमों में जैसे चित्रकला या अन्य साहित्यकलाओं में इस प्रकार की बातें सामने नहीं आती। बात केवल संगीत की ही है जिसमें सुर अनेकता में एकता का संदेश देते है पर कलाकार उन्हीं सुरों का साथ लेकर पंडित भी बनता है और उस्ताद भी बनता है।

सुर निरागस होते है पर हिंदू षडज और मुस्लिम षडज यह कल्पना करना ही बेमानी है। यही कारण है कि हम इंसानों से ये सुर अच्छे है जो हरदम सच्चे है और एक जैसे रहते है । कल्पना करे कि सा रे ग म कहे कि हम तो भाई पंडित जी के गले के लिए ही बने है और प ध नी बोले कि उस्ताद जी का गला ही हमारे लिए सबसे माकूल जगह है। उस्ताद या पंडित लगाना यह सम्मान की बात है और किसी भी कलाकार के प्रति आदरभाव प्रकट करने के लिए इस प्रकार की पदवियां लगाई जाती है।

पहले के जमाने में राजगायक या संगीत सम्राट,संगीत मार्तंड जैसी पदवियां लगाने की बातें भी सामने आती रही है और तब की बात करे तब यह बात जायज भी लगती थी क्योंकि राजदरबार था और जो श्रेष्ठ होता था उसे ही राजगायक की पदवी दी जाती थी। श्रेष्ठ में भी जो श्रेष्ठ होता था उसे संगीत सम्राट जैसी पदवियां दी जाती थी। उस समय राजाश्रय था और कलाकार का घर परिवार राजा की कृपा पर चलता था। जमीन जायदाद से लेकर धन धान्य सबकुछ अच्छा गाने पर ही निर्भर होता था। राजा अगर आपके गायन पर मोहित हो जाता था तब हीरे जवाहरात से घर भर देता था । यहां पर यह बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि चारण भाट और कलाकार में बड़ा अंतर रहा है और यह राजे-रजवाड़ो ने भी इस बात का ख्याल रखा कि कभी राजगायक चारण भाट की श्रेणी में न आ जाए। वैसे चारण और भाट की श्रेणी ही अलग है जिनका काम ही राजाओं की स्तुति करना होता था और उनके गुणगान करना होता था। उनकी तुलना कलाकारों से नहीं की जा सकती थी।

राजे-रजवाड़ो की परंपरा समाप्त हुई और आधुनिक युग में कलाकारों की कलाकारी को सरकारी तंत्र ने भी आकाशवाणी और दूरदर्शन के माध्यम से वित्तपोषित किया। परंतु यहां पर भी पंडित और उस्ताद कलाकार के नाम के आगे क्यों लगाया जाए इसे लेकर कोई स्पष्टता नहीं थी और यह बात लगातार चलती ही आई कि इस बारे में कोई तय मानक होना चाहिए।

अब बात करे संगीत के शैक्षणिक भाग की… देशभर के विश्वविद्यालयों में संगीत के कोर्सेस आरंभ हुए और बीए एमए जैसी डिग्रियां संगीत नृत्य में दी जाने लगी। पर यहां पर भी एक समस्या है कि एमए या फिर पीएचडी करने के बाद कोई कलाकार अपने नाम के सम्मुख डॉ. तो लगा सकता है पर इस बात की कोई ग्यारंटी नहीं की वह मंच पर स्तरीय प्रस्तुति दे सके। क्या डॉक्टरेट करने के बाद भी मंच पर प्रस्तुति देने लायक अगर कोई नहीं है तब ऐसे डॉक्टरेट डिग्री लेने और देने का क्या मतलब?

दक्षिण भारत में भी गायक और अन्य कलाकारों के नाम के आगे विद्वान लगाने की परंपरा है परंतु प्रश्न फिर वही है कि कलाकार की लोकप्रियता या विद्वता दोनों ही जब चरम पर हो तब उन्हें पंडित या उस्ताद कहा जाए या फिर यह प्रत्येक कलाकार पर निर्भर करता है कि वह कब अपने नाम के आगे इस प्रकार की पदवियां लगाए जब उसे सही मायने में इस बात का एहसास हो कि अब मैं अच्छा गाने लगा हूँ। आज देश के छोटे शहरों से बड़े शहरों की बात की जाए तब कोई भी कलाकार अपने नाम के आगे पंडित और उस्ताद लगा लेता है और टेलिविजन के म्युजिक रियेलिटी शोज ने तो नन्हें उस्ताद लगाना भी आरंभ कर दिया है।

इसका एक पक्ष यह भी है कि हिंदू कलाकार कहते है कि हम पंडित तो वैसे भी है और ब्राह्मण है तब तो हम बिना गाए बजाए भी पंडित तो है, फिर क्या समस्या है। वही उस्ताद लगाने वाले भी यही कहते है कि जब हम अपने फन में माहिर है तब क्या समस्या है?

एक पक्ष यह भी है कि अगर इस प्रकार की पदवियां लगाई जाती है तब कलाकार पर जिम्मेदारी भी आ जाती है कि वह प्रस्तुति के दौरान गुणवत्ता का ध्यान रखे। पर नन्हें उस्तादों का क्या जिन्होंने संगीत की दुनिया में हाल फिलहाल में ही कदम रखे है उन्हें उस्ताद कहना कहाँ तक ठीक है।

क्या भारतीय शास्त्रीय संगीत या संपूर्ण संगीत जगत को संगठित करने की जरुरत महसूस नहीं होती। जैसे सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर एक ऐसा बेंचमार्क है जहां तक पहुंचना हिमालय लांघने के समान है। वैसे ही भारतरत्न पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज, पंडित बिरजू महाराज, उस्ताद जाकिर हुसैन, उस्ताद अमीर खां साहब, उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहेब जैसे कलाकारों का नाम सामने आते ही मन में किसी भी प्रकार की शंका कुशंका नहीं होती क्योंकि यही तो गुणवत्ता के उच्च मानक है और यहां पर उस्ताद और पंडित जैसी पदवियां भी मायने नहीं रखती। और शायद यही बात है जो आज के कलाकारों खासतौर पर युवाओं को समझने की जरुरत है।

युवा कलाकार नाम, वेशभूषा, हावभाव बड़े कलाकारों जैसा करके यह समझने लगते है कि हम तो बन चुके और अपने नामों के आगे पंडित और उस्ताद लगाने लगते है जबकि संयम और नियम के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत में आगे बढ़ने  की जरुरत है।

फिर भी कई लोगो के मन में यह प्रश्न कुलबुला रहा होगा कि भाई पंडित तो पंडित है और उस्ताद तो वाह उस्ताद इससे फर्क क्या पड़ता है? तो बंधुओं! आप लोग अपनी प्रतिक्रिया दे, विचार लिखे तब इस मुद्दे पर सही राय बन पाएगी वरना अपने नाम के आगे जिसे जो लगाना है वह लगा तो रहा ही है और भविष्य में भी लगाता रहेगा।

Image Credit: Anandswaroop Manchiraju 

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