मालिनी मुजुमदार: कड़छी और कढ़ाई उसकी तिरकिट-धिरकिट

संगीत साधकों के जीवन साथियों को समर्पित आलेख

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श्रीमती मालिनी मुजुमदार: जन्म- २३ नवम्बर, १९३३ | निधन – १० फरवरी, २०१९

उस्ताद जहाँगीर खाँ साहब के ख़ास शिष्यों में से एक इंदौर के श्री दिनकर मुजुमदार… मेरे मौसाजी! मैं उन्हें मोठे बाबा (बड़े पिता) ही कहती आ रही हूँ… और उनकी अर्धांगिनी श्रीमती मालिनी मुजुमदार (मेरी अक्का मावशी)… चेहरे पर ‘स्मित’ हास्य लिए हर आंगतुक के स्वागत के लिए सदैव तत्पर रहने वाली महिला… बाबा के बाएँ का कोई सानी नहीं है… बायाँ मतलब तबले के साथ का डग्गा… वैसे ही उनकी वामांगी (अर्धांगिनी-वामा) का भी कोई कैसे सानी हो सकता है? बाबा कहते बायाँ पक्का होना चाहिए… जीवन पथ पर भी उनकी वामा, उनकी पत्नी इसी तरह से उतनी ही पक्की थी… किसी भी परिस्थिति में दृढ़ता से खड़ी रहने वाली.. न केवल पति के लिए बल्कि घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार और ‘संगीत’ के लिए भी और संगीत की दुनिया से जुड़ने वाले रिश्तों के लिए भी.. गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन उनके घर में होता रहा और वे सबकी सही अर्थों में गुरु ‘माँ’ बन गई.. उनकी दोनों बेटियाँ उन्हें ‘माँ’ पुकारती पर वे तो जगत् जननी की तरह सबकी ‘माँ’ थीं।

तबले के क्षेत्र में मोठे बाबा का नाम कितना मोठा-बड़ा है यह तो उन्हें जानने वालों से मेल-मुलाकात होने पर पता चलता है… उनके यहाँ वर्ष 1958 में उस्ताद जहाँगीर खाँ साहब खुद आकर रहे थे.. और तब मौसी उनकी ब्याहता हो चुकी थी… फकीराना उस्ताद का शिष्य भी उनकी तरह आजीवन फकीराना मिज़ाज का रहा और मौसी ने भी कभी कोई माँग नहीं की… उस्ताद साहब जिस घर पर मेहमान बनकर पधारे उस दर पर बरकत-नेमत, नाना मेहमानों का रूप लेकर आती रहीं… मेहमान केवल सगे वाले ही नहीं बल्कि संगीत के क्षेत्र के कई दिग्गज कलाकार और मौसी कलाकारों की सेवा में जुटी रहीं…

मेरी गर्मी की छुट्टियों सहित हर छोटी-बड़ी छुट्टियों का डेस्टिनेशन उसका घर ही हुआ करता था…फिर जीवन से गर्मी की छुट्टियाँ चली गई…काम से छुट्टी जैसा वक्त ही नहीं रहा…और अब तो वह डेस्टिनेशन भी नहीं रहा….उसके यहाँ मेहमानों की आवाजाही और उन मेहमानों तक को मैं बताती कि छुट्टियों में मैं आपको यहीं मिलूँगी…

तबले के क्षेत्र का बड़ा नाम पंडित लालजी गोखले (पुणे) भी उनके घर चार दिन रहे थे.. यह तो किस्से हैं जो मुझे सुनकर पता है लेकिन ऐसे और भी अनगिनत किस्से हैं जिनकी मैं साक्षी रही हूँ। संगीत के क्षेत्र की किसी भी बड़ी हस्ती का नाम लीजिए… और मौसी के यहाँ उनकी आमद को सुनिश्चित मानिए। आज के युवा ध्रुपद गायकों में से किसी का नाम लीजिए या पखावज वादकों में से किसी का… या गायन, वादन, नर्तन से जुड़ा कोई भी नाम, उनकी ड्योढ़ी पर आया और मेहमान नवाज़ी, खातिरदारी, स्नेह-सम्मान पाकर नतमस्तक हो गया। कितने लोग आते-जाते रहते थे, बीच शहर में उनका घर था… रेशम वाली गली से लेकर हरसिद्धी तक…और जो कोई शहर आता उनके घर अवश्य आता… अभी अभी महावीर नगर के घर तक भी यह मैंने देखा है और हर किसी की मेहमान नवाज़ी का सारा जिम्मा मौसी पर था… बहुत प्यार और अपनेपन से उसने इसे निभाया भी। बाबा कहते ‘तीन ताल’ सीखने में ही सालों लग जाते हैं, बाबा तीन ताल के कायदे-रेले-पलटे पर हाथ आज़माते होते और मौसी रसोई में पकवान बनाती रही… खास मराठी व्यंजन.. वैसे ही जैसे पहले तीन ताल पक्का होना चाहिए, वैसे ही चूँकि वे मराठी थीं तो पहले मराठी थाली ही बुनियादी तौर पर कितनी विविधता से भरी है, उसे पूरी तरह बनाना चाहिए… पूरण पोली (चने के दाल की मीठी रोटी) तो सबको पता है लेकिन उसके अलावा भी कई सुस्वादु पदार्थ हैं। आपने मराठी थाली का भोजन किया है कभी! मराठी थाली के दाईं ओर तथा बाईं ओर खास तरीके से भोजन परोसा जाता है… बाईं ओर नमक, नींबू, चटनी, कोशिंबिर और दाईं ओर सब्जियाँ… तबले के दायें-बायें को सुनते हुए मौसी के कान तैयार हो रहे थे और भोजन की थाली में हर दिन दायाँ-बायाँ उसी क्रम में अनवरत सजता हुआ हर थाली को भोग की, प्रसाद की थाली बना रहा था। उसके हाथ की खास आलू की सब्जी, मटकी की उसल, रोटी पर अतिरिक्त घी चुपड़कर देना, सौंठ के लड्डू खिलाना..वो खास मराठी स्टाइल का चिवड़ा, वो कढ़ी, वो चिरोटे, वो चैत्र के महीने में बनने वाली खास दाल-करंजी (मराठी व्यंजन)… उसके हाथों का वो स्वाद… अन्नपूर्णा क्या होगी यह उसे देख लगता था…

मौसी उन दिनों की धरोहर थीं जब यह माना नहीं वस्तुत: किया जाता था कि अपने बच्चों को दूध में पानी मिलाकर पिला दिया तब भी चलेगा लेकिन दूसरों की खातिरदारी में कमी नहीं आनी चाहिए… दूसरों की थाली में ज्यादा घी परोसने में उसका खुला हाथ था,वैसे ही जैसे तबले में बजता है ‘खुला हाथ’। तबला भी कभी दबा-दबाकर नहीं बजाना चाहिए… है न बाबा? तबला बजाते हुए कभी शो-ऑफ़ नहीं करना चाहिए… मधुर मुस्कान से तबला बजाना चाहिए, कंधे नहीं उचकाने चाहिए, लटके-झटके नहीं होना चाहिए… तबला सीखने वालों को बाबा यह बताते और मौसी उसी सहज भाव से रसोई में लगी होती… बाबा कहते तबले की किनार की चाटी की आवाज़ साफ़ आनी चाहिए, मौसी उतने ही हौले से मुझे कहती-रोटी को किनारे से बेलना चाहिए तो रोटी पतली बनती है और गोल-गोल।

बाबा (श्री दिनकर मुजुमदार) ने कितनों को ही तबला सिखाया बिना कोई मूल्य लिए… गुरु-शिष्य परंपरा की तरह… कितने उनके यहाँ सीखकर बड़े नामी हो गए और अपने गुरु का नाम नहीं लिया लेकिन उन्होंने शिकन नहीं की… मावशी कहती गुरु से दग़ा नहीं करना.. मावशी अपनी बेटियों की तरह यह सीख मुझे भी देती कि कोई कैसे भी व्यवहार करें पर अपनी ओर से व्यवहार में चूक नहीं होनी चाहिए।

दोनों ताई (बेटियाँ) और बाबा रियाज़ करते तब वह रसोई संभाल रही होती थी… मैं रसोई में ताँक-झाँक करने लगूँ तो पूछती- ‘भूख लगी है क्या?’ मेरी भूख से लेकर अब मेरी बेटी की भूख तक को वह पूरा करने में लगी रहती.. अब मेरी बेटी से पूछा करती ‘भूख लगी है क्या, दूध पीना है क्या? शर्माओ मत’… उनके घर से भला कौन भूखे पेट लौट सकता था? तबला सीखने आने वाले शिष्य भी चाय-नाश्ता किए बिना नहीं जाते थे…इतना पेट भर-भर कर खिलाती थी कि अघा जाएँ। उसने तबले का रियाज़ नहीं किया लेकिन कड़छी और कढ़ाई उसकी तिरकिट-धिरकिट हुआ करती थी… गोल-गोल रोटियों की भाँप निकाल, वो तबले के साथ थाप देती थी…

मौसी मेरे लिए मासी थी-माँ जैसी, बचपन के कितने सारे दिन उसके घर पर बीते थे… कितनी सारी यादों के साथ..मेरे बचपन की यादें उसके पास मुझसे ज़्यादा थी… काम करने से हो चुके उसके खुरदुरे हाथों का स्पर्श…. अब भी याद है…. उसकी हिदायतें..उसकी डाँट लेकिन उससे कहीं ज़्यादा उससे मिलने वाला प्यार…

उसके लिए पूरब बाज और दिल्ली बाज तबला उसकी रसोई थी, उस ज़माने की अंग्रेजी स्नातक होने के बावजूद नौकरी नहीं की, क्योंकि घर-परिवार देखना था, बेटियों के साथ हर कार्यक्रम में हर जगह गई कि कहीं ऐसा न हो कि बेटियों को लगे कि वे लड़कियाँ हैं, इसे फलाँ जगह नहीं जा सकती, फलाँ-फलाँ नहीं कर सकती। तब उस शहर में वे रहते थे जो कस्बे से उबर ही रहा था… बात है आठवें और नौवें दशक की जब लड़कियों की शादी होना उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। तब मौसी ने साफ़ कहा था बेटियों की शादी में देरी हो जाएँ चलेगा लेकिन बेटियाँ ऐसे घरों में ब्याहूँगी जहाँ उनकी कला को प्रोत्साहन मिलेगा..तबले के क्षेत्र में जब केवल दो-तीन महिलाओं के नाम थे तब उनके घर में उनकी बेटी संगीता ताई (श्रीमती संगीता अग्निहोत्री) उदीयमान तबला नवाज़ बन उभर रही थीं… बेटी के तबले को प्रोत्साहन देना, दूसरी बेटी की सितार (स्मिता ताई- श्रीमती स्मिता वाजपेयी) के सुर संभालना, पति की रियाज़ के समय के साथ उनके खाने-पीने के समय का भी पालन करना और भर-भर कर मेहमाननवाज़ी करना.. यह तबला बजाने वाले पति के प्रति प्यार, आदर की मौन अभिव्यक्ति नहीं तो और क्या थी, यह तबले के प्रति निष्काम श्रद्धा नहीं तो और क्या थी…

मालिनी मुजुमदार अपनी बेटियों स्मिता-संगीता तथा पति दिनकर मुजुमदार के साथ

तबले की वजह से उनका घर कभी नहीं चला, बाबा गणित सिखाते रहे आजीवन..गणित की ट्यूशंस लेते रहे..पर तबले को नहीं बेचा न मौसी ने कला को कभी बिकने दिया… उस घर से तबले के बोल, सितार की गूँज और रियाज़ करने आने पर घुँघरूओं की आवाज़ सुनाई पड़ा करती थी… वे संगीत के मंदिर की मौन उपासक थीं।

अनगिनत यादों की पोटली थी… और बाद के दिनों में तो वह खुद गठरी जैसी ही होती जा रही थी…हर बार उससे मिलकर लौटने पर लगता पता नहीं अगली बार मुलाक़ात होगी भी या नहीं… और हर बार इस डर पर उसका स्निग्ध स्नेह जीत जाता…

चमड़े से बना तबला कसने पर मधुर बजता है वैसे ही जीवन भर उसने खुद की देह को कसकर रखा…तबला बजाकर बाबा के हाथ पर गट्टे पड़ते रहे, संगीता ताई के कोमल हाथ सख़्त होते गए…स्मिता ताई की अंगुलियों पर सितार बजाने के निशान पड़ते रहे..सबने देखें…पर मौसी का साइटिका.. उसकी असह्य पीड़ा कितनों को दिखी होगी जबकि वह घंटों खड़े रहकर मुस्कुराकर रसोई संभालती रही…

वसंत पंचमी के शुभ दिन उसे थोड़ी-सी धाप (मराठी शब्द, हिंदी- हाँफ) लगी…उसने पति के हाथों पानी पीया..दरअसल वह धाप नहीं उसका अंतिम ‘धा’ था … आजीवन अपने साथी की संगत करते हुए उसने उतनी ही सहजता से सम पर विराम लिया…

8 Comments

  1. संजीव विवेचन, शब्द – शब्द यादों के झरोखों से बहता हुआ।

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  2. अंतिम दो परिच्छेद गहरे तक भिगो देते हैं। मौसी की स्मृतियों को नमन करता संस्मरणात्मक आलेख भी मौसी की तरह ही ‘सम’ पर विराम लेता है।

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  3. गजब का भावनात्मक , लेकिन संतुलित लिखा है । वह मासी नहीं , माँ ही थी ।

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  4. श्रद्धांजलि का यह अनूठा अंदाज दिल को छू गया। तबला, रोटी, रसोई का त्रिवेणी संगम, शब्दों की लय-ताल वाली जुगलबंदी ने अदभुत बना दिया है। 🌹

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    • आप गुणीजनों से सीखते-सीखते ही पहुँच पाऊँगी शायद उस पार…

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