कथक में ‘करियर’ करना है या कथक करना है?

महाराष्ट्र शासन शिक्षा विभाग के निर्णयानुसार दसवीं कक्षा के छात्रों को अखिल भारतीय गांधर्व महाविद्यालय मंडल की परीक्षाएँ उत्तीर्ण करने पर एसएससी बोर्ड द्वारा अतिरिक्त अंक दिए जाएँगे। इसके बाद तो पहली तीन परीक्षाएँ देने वालों की बाढ़ आ गई है।

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किसी भी बड़े कलाकार की प्रस्तुति देखने जाते हैं तो आप प्रस्तुति देखते हैं या उसकी डिग्री? परफॉर्मिंग आर्ट तो रियाज़ माँगती है, डिग्री उसके सैद्धांतिक पक्ष को आपको समझा देगी लेकिन यदि आपको कलाकार बनना है तो आपको कला पेश करनी ही होगी… गायक को गाना ही होगा, वादक को बजाना ही होगा और यदि वह नर्तक है तो उसे नृत्य करना ही होगा।

गायन-वादन के क्षेत्र में फिर भी वह काम हो रहा है, जो उनका काम है लेकिन नर्तक, नृत्य छोड़ बहुत कुछ करते हैं। तिस पर इस तरह की कारगुज़ारियाँ कथक के क्षेत्र में अधिक हो रही हैं। ओड़िसी, भरतनाट्यम या कथकली-मणिपुरी आदि के नर्तक अपनी आदि परंपरा से जुड़े हैं और बहुत अल्प मात्रा में कुछ अलग करते हैं लेकिन कथक नर्तक कोरियोग्राफी से लेकर, कॉस्ट्यूम, लाइट्स और कंटेम्पररी तक हर जगह हाथ आज़माता नज़र आता है। कथक में ‘करियर’ करना है या कथक करना है, इसका जवाब इन दिनों तो यही मिलता है कि कथक सधे न सधे पर कथक में करियर साध लेना है। साधना से नहीं, बल्कि जुगाड़ से।

इसे हवा देने के लिए कथक के बीसियों स्कूल खुल गए हैं, जिनमें कथक के साथ बॉलीवुड भी सिखाया जाता है और सालाना वार्षिकोत्सव में मंच भी दिया जाता है। एक-दो वंदनाएँ सीख लीं, थोड़े बहुत तोड़े-टुकड़े कर लिए और बहुत सारा ग्लैमर, तामझाम, मेकअप, लाइट्स की जोड़ से प्रस्तुति हो जाती है। जिसे देखने अभिभावक और खींच-तानकर लाए गए दोस्त-रिश्तेदार आ जाते हैं, महफिल सज जाती है और तालियाँ बज जाती हैं। लेकिन क्या इसका मतलब कथक आ गया यह मान लिया जाए? नहीं! फिर अगला प्रश्न आता है, कितनी परीक्षाएँ दीं? और इन परीक्षाओं के साथ एक अलग नौटंकी शुरू हो जाती है। परीक्षा देना मतलब हाथ में ऐसा दस्तावेज आना जिससे आगे चलकर नौकरी मिल जाएगी, पेट-पानी की व्यवस्था हो जाएगी। पर क्या पेट-पानी के लिए कथक सीख रहे हैं या कथक के लिए कथक सीख रहे हैं? जवाब साफ है कि डिग्री होगी तो लोग पूछेंगे, लोग पूछेंगे तो आगे चलकर क्लास खोल सकेंगे और क्लास खोल ली तो पैसों की जुगत हो जाएगी…एक और क्लास और एक और अगला समीकरण।

परीक्षाओं के खेल में अंकों की जोड़-तोड़ नए सिरे से देखने को मिल रही है। महाराष्ट्र शासन के शिक्षा विभाग द्वारा लिए गए निर्णयानुसार पिछले दो वर्षों से दसवीं कक्षा में सम्मिलित होने वाले जिन छात्रों ने अखिल भारतीय गांधर्व महाविद्यालय मंडल (अ.भा.गां.म.वि. मं.) की तीन (प्रारंभिक, प्रवेशिका प्रथम और प्रवेशिका पूर्ण) या पाँच (उक्त तीन और मध्यमा प्रथम तथा मध्यमा पूर्ण) परीक्षाएँ उत्तीर्ण की हैं उन्हें एसएससी बोर्ड द्वारा अतिरिक्त अंक दिए जाएँगे। इसके बाद तो पहली तीन परीक्षाएँ देने वालों की बाढ़ आ गई है। मंडल से जुड़े सूत्र बताते हैं कि मंडल का ही अलिखित आदेश है कि बच्चों को प्रोत्साहित किया जाए। पहली दो परीक्षाओं में सभी को उत्तीर्ण कर दिया जाए। इन सभी मतलब विशारद तक की परीक्षाओं में एक-एक केंद्र से 100 से लेकर छह हज़ार तक छात्र बैठते हैं। सुदूर आसाम से केरल तक 1200 संबद्ध संस्था और 800 परीक्षा केंद्र हैं। प्रारंभिक से संगीत आचार्य तक हर साल लाखों छात्र परीक्षा देते हैं तो इस लिहाज़ से इतने संगीतज्ञ बनने चाहिए। पर क्या ऐसा होता है? नहीं न, क्यों नहीं? क्योंकि इन परीक्षाओं में जो धाँधलियाँ हो रही हैं उससे परीक्षा देने वाले सचमुच सीख पाएँ या नहीं इस पर संदेह होता है।

पुणे के बिबवेवाड़ी के किसी केंद्र से 30 विद्यार्थी कथक की पहली तीन परीक्षाओं में बैठे तो आपसी सहमति से यह तय हो गया कि केंद्र पर ही परीक्षा ले ली जाएँ और विशारद किए किसी पहचान वाले से हस्ताक्षर करवा लिए जाएँ। विश्रांतवाड़ी के किसी केंद्र से 15 छात्र हों तो सुविधा देख यही मार्ग अपना लिया गया। मतलब छात्रों ने परीक्षा दी या नहीं दी, ठीक से किया न किया सब ‘गुरु घंटाल’ को ही पता होगा। मंडल द्वारा परीक्षक का मानधन भी न के बराबर है। प्रारंभिक के प्रति छात्र का 10 रुपए और प्रवेशिका पूर्ण तक 15 रुपए प्रति छात्र मानधन मिलता है तो जिसके यहाँ से परीक्षा दी जा रही है वह अपने ही किसी पुराने विद्यार्थी से हस्ताक्षर करवा काम चला लेता है। सुनने में तो यह भी आया है कि पिछली जो कमेटी थी उसने तो ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ की तरह यह निर्णय लिया था कि यदि किसी ने फॉर्म भरा है तो ऐसे सभी छात्रों को सर्टिफिकेट दे दिया जाए। गज़ब! तब आपको याद हो तो तीन साल की विशारद की परीक्षा की गई थी लेकिन फिर कमेटी बदली और यह ‘तुगलकी निर्णय’ वापिस लिया गया।

कथक स्कूलों के व्यवस्थापकों का अपना अलग रोना है। उनका कहना है कि इस सत्र की परीक्षाएँ किसी भी सूरत में 25 मई तक निपटाकर उसके अंक मंडल को भेजने हैं। ज्ञातव्य है कि गंधर्व मंडल की संगीत की परीक्षाएँ दो सत्रों में ली जाती हैं। एक सत्र नवंबर-दिसबंर का होता है, दूसरा अप्रैल मई का। तो इस सत्र की परीक्षाएँ किसी भी तरह जल्दी से जल्दी निपटानी है। केंद्र उसे ही मिलता है जिसके पास खुद की जगह है, जिसके पास अपनी जगह नहीं उसे दूसरे किसी के केंद्र में परीक्षाएँ दिलवाने ले जाना पड़ता है। जिसके पास अपनी जगह है, उसके पास उसके अपने छात्र भी हैं, वह उनकी परीक्षाएँ करवाएँ या किसी और की, सो वे कहते हैं अपने स्तर पर ही अंक दे दो। यह सबके लिए ‘विन-विन सिचुएशन’ होती है, सबकी ‘सारी अंगुलियाँ घी में और सिर कड़ाही में’…. नृत्य स्कूलों का रिजल्ट शत-प्रतिशत आ जाता है, बच्चे खुश उनके पालक खुश और अगले साल की ‘बैच’ तय।

बीते 48 वर्षों से गांधर्व मंडल की परीक्षाओं का एक केंद्र गोडसे विद्यालय है। आनंद गोडसे ने बताया “पुणे में सात-आठ केंद्रों से परीक्षार्थी बैठते हैं। मेरे ही केंद्र से छह हज़ार छात्र बैठते हैं, यदि सबकी परीक्षाएँ ही करवाते रहें तो दो-तीन महीने परीक्षाओं में ही निकल जाएँगे…”

सचिव श्री पांडुरंग मुखड़े – “नो कमैंट्स”

केवल प्रारंभिक के ही पुणे से पौने तीन हजार विद्यार्थी हैं। परीक्षक प्रेक्टिकल देखते हैं या नहीं, या केवल साइन हो जाते हैं यह देखने कोई नहीं जाता। इन सब पर मंडल के सचिव श्री पांडुरंग मुखड़े ने कोई भी टिप्पणी देने से इंकार कर दिया।

जैसा कि सभी को ज्ञात है कि पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने हिंदुस्तानी संगीत का पाठ्यक्रम बनाया तो कथक के शिक्षण-परीक्षण को व्यवस्थित रुप देने का श्रेय प्रो. मोहनराव शंकरराव कल्याणपुरकर को जाता है। पाठ्यक्रम बनाने के बावजूद पं. भातखंडे ने स्पष्ट कहा था कि “हमारी डिग्री प्राप्त करने का यह अर्थ नहीं है कि हम संपूर्ण संगीतज्ञ बन गए हैं, इसका अर्थ है कि अब हममें संगीत सीखने की योग्यता आ गई है।”

पहले के गुरु बहुत सिखाते नहीं थे, नौकरी नहीं करने देते थे क्योंकि नौकरी करने से कई बंधन आ जाते हैं। कोई 50 वर्ष की आयु का हो गया तब उसे नौकरी करने की अनुमति देते थे वह भी संगीत से संबंधित ही। लेकिन अब तो करियर की सुरक्षा के नाम पर जैसे दूसरी डिग्रियाँ हासिल की जाती हैं वैसी ही संगीत की डिग्रियाँ हासिल की जाती है। करियर करना है या डांस (नृत्य) करना है इस बारीक भेद को समझना होगा। आगे चलकर दूसरों को सीखा सकें, इसलिए इसलिए सीखना है या अपने लिए सीखना है। अपने लिए सीखेंगे तभी गुरु से जो सीखा उसमें नया जोड़ पाएँगे अन्यथा ग्रुप डांसर या क्लास के कार्यक्रमों में भाग लेकर इतिश्री हो जाएगी और यह अन्य करियर संभालकर भी आसानी से हो सकता है। लेकिन एकल प्रस्तुति के लिए घाम-पसीना गलाना पड़ेगा..रोज़…. फुल फ्लैश कथक ही करना होगा। जैसे देश की हिफाजत सेना करती है उसी तरह इस धरोहर की हिफाजत कौन करेगा, यह सवाल खुद से पूछकर कला साधना करनी होगी।

पंडित भीमसेन जोशी तानपुरा बजाते हुए | चित्र साभार: विकिमीडिआ

पुराने गुरुओं के ऐसे कई किस्से मशहूर हैं कि कोई शागिर्द सीखने गया तो पहले उससे कई महीनों तक घर के काम करवाए और उसके कानों में सुर-ताल के नाद गूँजते रहे.. फिर कई सालों तक एक ही पलटा, या एक ही बोल या एक ही राग बजवाया… करवाया… इतना ही नहीं केवल ‘सा’ इतना ही लगवाते रहे… ये किस्से, वे किस्से थे जो उस समय की परंपरा को दिखाते थे कि पहले कानों से रियाज़ हुआ, फिर असली रियाज़ हुआ। किस्सों पर ही क्यों जाएँ यह तो सर्वविदित है कि पंडित भीमसेन जोशी को बचपन से ही संगीत का बहुत शौक था। वे किराना घराने के संस्थापक अब्दुल करीम खान से बहुत प्रभावित थे। 4 फरवरी 1922 को जन्मे पंडितजी वर्ष 1933 में गुरु की तलाश में घर से निकल पड़े थे। लालजी गोखले तबले के क्षेत्र में इतना बड़ा नाम थिरकवा खाँ साहब से तबला सीखने के लिए महज़ 8 वर्ष की आयु में घर से निकल गए थे।

सितारा देवी जी ने तो जब नृत्य सीखना प्रारंभ किया तब भले घर की लड़कियाँ नृत्य नहीं करती थीं। जब भी सितारा देवी और उनकी बहनें तारा देवी और अलकनंदा किसी प्रस्तुति के लिए जाती थीं तो उनकी गाड़ी के आस-पास लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाती थी, जो तालियाँ-सीटियाँ बजाते, उनसे भद्दे तरीके से पेश आते और कहते कि वेश्याएँ आ रही हैं। बनारस में जहाँ सितारादेवी अपने पिता सुखदेव बाबा के साथ रहती थीं, उनके उस घर पर पुलिस आ गई थी, यह कहने के लिए कि वे तुरंत घर खाली कर दें। इतना सब झेलने के बाद भी क्या उन्होंने सीखना छोड़ दिया था?

पंडित बिरजू महाराज

केवल सात साल की उम्र में देहरादून में नृत्य प्रदर्शन कर लोहा मनवाने वाले बिरजू महाराज ऐसे ही कथक की दुनिया का इतना बड़ा नाम नहीं बने। उन लोगों ने बहुत परिश्रम कर शास्त्रीय नृत्य कथक को वह सम्मान दिलवाया, तो क्या केवल इसलिए ताकि आज के कई तथाकथित नर्तक उसका धंधा कर सकें? उससे भी पहले स्थितियाँ इतनी विकट नहीं, तो उतनी अच्छी भी नहीं थीं। तब पुरुष गुरु हुआ करते थे और महिला हुई तो वह राजा या नवाब के दरबार में नर्तकी होती थी। या उससे भी पहले मंदिर के प्रांगण में देवदासियाँ बनकर नाच रही थीं। ब्रिटिश शासन से कई सालों पहले ज़रूर स्त्री-पुरुष समान अधिकार से नृत्य करते थे, हर समुदाय-समाज में उनकी प्रतिष्ठा हुआ करती थी। तब राजा से लेकर प्रजा तक जो भी गायन-वादन-नृत्य करता था वह साधना की तरह दैनिक रियाज़ करता था और कभी किसी ख़ास अवसर पर प्रस्तुति दी जाती थी। प्रस्तुति देने या कार्यक्रम हासिल करने के लिए जोड़-तोड़ नहीं होती थी।

मतलब क्या है, मतलब है कि तब सीखना मुख्य कार्य होता था, सीखना और वह भी पूरी तन्मयता से। दुनिया की दुनियादारी, चमक-दमक, मौज, आराम, चैन इन सबसे क्या वास्ता होना चाहिए? जब तक सीख रहे हैं तब तक सीखना ही चाहिए लेकिन अब यह साइड हॉबी या ऐसा कुछ हो गया है जिसे चलताऊ तरीके से निपटाया जा सकता है। अब सीखने के लिए सीखा नहीं जाता बल्कि और भी कई कारण होते हैं जिस वजह से सीखा जाता है… ख़ासकर कथक नृत्य के क्षेत्र में तो ऐसा ही हो रहा है। कथक नृत्य विद्यालयों में चले जाइए, वहाँ जो अभिभावक आते हैं उनका पहला ही सवाल होता है… परीक्षा कब दे सकते हैं? मंच पर प्रस्तुति होगी न? अरे थोड़ा सीखने तो दीजिए… आपको सीखना नहीं बल्कि शो-ऑफ़ करना है। फिर ‘जैसा तेरा गाना, वैसा मेरा बजाना’ की तर्ज पर कथक में करियर के आयाम समझाए जाते हैं। कथक करना है या करियर… कथक करना है तो कथक कीजिए, करियर अपने आप हो जाएगा, लेकिन नहीं आपको तो सीखने से पहले वह सीखने से क्या लाभ होगा इस गणित को समझना है। डांस में करियर करने के लिए परीक्षा देते हैं… माना कि जीवन में संपत्ति-आर्थिक सुरक्षा आदि बहुत ज़रूरी है लेकिन पहले ऐसा कब था? पहले के कलाकार माता-पिता या गुरु की छत्र-छाया में तालीम लेते थे, 20-22 साल तालीम लेने के बाद कार्यक्रम देते थे,थोड़ा गुज़ारा हो जाए इसलिए थोड़ी बहुत ट्यूशंस ले लिया करते थे। जितना मिल जाता था उसमें संतुष्ट रहते थे। गाड़ी-बंगले के सपने नहीं देखते थे, न उस तरह गला काट प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनते थे। डिग्री लेना और फिर उसका धंधा करना और धंधे के लिए फिर किसी और को डिग्री दिलवाने के मार्ग पर चलवाना… औसत दर्जे का बनने के लिए इतना काफी है लेकिन यह करके नर्तक कहलवाना शर्मनाक है।

तो करना क्या होगा? करना यह है कि डांस में करियर करना है तो पहले डांस कीजिए। पहले कभी कथक करने वालों के साथ गाने-बजाने वालों को समाज में हीन समझा जाता था। उन्हें मिरासी-बाईजी कहकर समाज से लगभग बहिष्कृत कर दिया जाता था। अब ऐसा नहीं है, तो अब संगतकार साथ-संगत करना पसंद नहीं करते। आपने सुना होगा कि कथक नर्तकों को संगत करने वाले नहीं मिल पाते… क्यों? क्योंकि उन्हें नृत्य के साथ गाने या बजाने में शर्म आती है। मान लिया जाता है कि जिस गायक-वादक को और प्रस्तुतियाँ नहीं मिल रहीं वे कथक के साथ गा-बजा रहे हैं। दक्षिण के नृत्यों के साथ ऐसा नहीं होता, कथक के साथ ऐसा होता है इसलिए कथक कहा… कथक के अलावा अन्य शास्त्रीय नृत्यों के साथ गाने वाले गायक के लिए वह अभिमान की बात होती है पर कथक में नहीं। संगीत समारोह में भी कथक की एकाध प्रस्तुति होती है। अलग से नृत्य महोत्सव होते हैं लेकिन उन्हें देखने जाने वाले दर्शक भी अलग होते हैं और उनके भी अपने गणित होते हैं। डांस के ज़रिए बहुत कुछ साधते आता है इस सोच की वजह से कथक का हश्र हो रहा है और उसे वह सम्मान नहीं मिल पा रहा। तो समझ लीजिए कि नृत्य किए बिना नृत्य नहीं आ सकता… नृत्य करके दिखाना पड़ता है, परीक्षाओं के अंकों के झोल के बाद उसकी पोल तब खुलती है जब कोई उसे कुछ प्रस्तुत करने के लिए कहता है। उसके अंक, उसके सर्टिफिकेट कोई मायने नहीं रखते और तब केवल यह मायने रखता है कि उसके पैर उठ पाते हैं या नहीं, वह कुछ कर पाता है या नहीं.. वरना तो है ही ‘बंद मुट्ठी लाख की और खुल गई तो ख़ाक की’।

One Comment

  1. I am totally against the exam driven Kathak teaching. I am a kathak performer, teacher and examiner. I have experienced the same, just passing exams and not learning the Art form. I pointed the currption to the Chair and many other authorities but they said they realize it but nothing can be done about it.

    The Teachers have be truthful and sincere to their Art to make a change.

    I am willing to join the Forum to bring a change to save the purity of the form.

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