होरी के लिए राग काफी ही क्यों ?

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होरी मैं खेलूंगी उन संग डट के जो पिया आयेंगे ब्रिज से पलट के… शोभा गुर्टू के गाए इस होरी को राग शहाना कान्हाडा में गाया गया है । इस होरी का असर बहुत लंबे समय तक आप पर पड़ता है परंतु होरी याने राग काफी ऐसा कहा जाता है पर ऐसा क्यों ? राग काफी में ऐसा क्या है कि होरी याने राग काफी।

अगर राग काफी के बारे में जाने तब इसकी रसोत्पत्ती याने श्रृंगार रस की है। श्रृंगार याने सौंदर्य और होरी जैसे राम सिया फाग मचावत का अलग ही आनंद आता है।

कहते राग काफी की गिनती काफी युवा राग के रुप में होती है क्योंकि यह आज से कुछ सौ वर्ष पूर्व ही शामिल हुआ है। इसे संपूर्ण राग भी है इसके कारण इसे गाना भी आसान है। इतना ही नहीं यह राग लोक संगीत से शास्त्रीय संगीत में आया है। लोक रंग में रंगे इस राग को वैसे भी सुनना आनंददायक है परंतु जब होरी के शब्द इसके साथ जुड़ जाते है तब इस राग का सौंदर्य अलग से दमक उठता है। कृष्ण-राधा और गोपियों के बीच होरी की बात ही अलग है। अधिकांश होरी इन पर बनी है। ऐसा भी नहीं है कि केवल काफी राग में गाई होरी ही प्रसिद्ध है। खमाज, सारंग, पीलू जैसे रागों में भी होरी काफी अच्छी लगती है और काफी प्रसिद्ध है। वर्तमान में केवल काफी नहीं बल्कि मिश्र काफी में गाई होरी जुदा अंदाज में प्रस्तुत की जाए तब अलग ही असर डालती है।

होरी जल्दबाजी का गायन नहीं है और जब संपूर्णता के साथ गाई जाती है तब राग काफी का सौंदर्य पूर्ण यौवन पर आता है और सही मायने में अपना असर डालता है। रंग… मस्ती… आनंद को द्विगुणित करने वाली होरी काफी राग में बेहद जचती है, ऐसा भी कहा जा सकता है पर इसका मतलब यह भी नहीं की काफी राग में केवल होरी ही गाई जाए। राग काफी अपने आप में संपूर्णता लिए हुए है पर जब मिश्र स्वर अपना असर डालते है तब सुरों का एक दुसरे के साथ अठखेलिया खेलना और गलबहिया डाल कर घूमना बेहद रोमांचित करता है। फाग के मौसम में काफी राग की होरी वैसे भी मन को मदमस्त करने के लिए काफी है इसलिए होरी है तो राग काफी जरुरी है।

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