गुरू-शिष्य पद्धति एवं संस्थागत शिक्षण पद्धति: एक तुलनात्मक अध्ययन

October 12, 2018
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संगीत के क्षेत्र में जहाँ गुरु-शिष्य पद्धति का महत्व सदा ही रहा है, वहीं आधुनिक समय में विश्वविद्यालयीन उपाधियों का महत्व नकारा नहीं जा सकता। संगीत की शिक्षा के लिए गुरु-शिष्य पद्धति श्रेष्ठ है या संस्थागत पद्धति? यह हमेशा से बहस का विषय रहा है।
जहाँ दोनों पद्धतियों के अपने-अपने गुण है तो दोष भी है। इसी विषय पर संगीतज्ञ पंडित हनुमान सहाय ने तुलनात्मक अध्ययन किया जिसे हम जस का तस प्रकाशित कर रहे हैं :-

भारत देश धर्म प्रधान देश होने के कारण यहाँ हर विद्या के लिए गुरू बनाया जाता है। वह चाहे गुरूकुल में विद्यार्जन का केन्द्र हो या शिक्षण संस्थाऐ हों। भारतीय माता-पिता का मानना है कि प्रत्येक बच्चे का रूझान अलग-अलग होना स्वाभाविक है। जिसमें वर्तमान में तो अधिकांश यही हो रहा है, कि बच्चे अपने पैतृक कार्य में कम ही प्रवृत हो रहें हैं। अपवाद स्वरूप भले ही कोई बच्चा अपने पैतृक कार्य को करता हुआ पाया जायेगा अन्यथा कोई भी बच्चा ऐसा नहीं कर रहा है। यह बात जब अभिभावकों के गले उतरी तो कहने भी लगे और माननें भी लगे कि हम तो आपके जन्म दाता अवश्य है, किन्तु विद्यादाता गुरू व आचार्य ही है। गुरू- शिष्य पद्वति का महत्वपूर्ण अंग यदि है तो वो है कि गुरू अपने शिष्य को अपने जैसा ही करके जनकल्याण हेतु भेजता है।

भारतीय विद्वानों ने चार प्रकार के गुरू बताये है प्रथम दीपक, द्वितीय पारस, तृतीय भ्रमरी व चतुर्थ चन्दन के समान इनमें श्रेष्ठ गुरू भ्रमरी को व दीपक को बताया क्योंकि भ्रमरी कहीं से भी एक लट या क्रमी को दीवार पर मिट्टी से बने हुए एक छेद में रखकर उसके चारों और घूम घूमकर उस लट रूपी कीड़े को अपना जैसा बना लेती है और यहीं क्रम उस लटरूपी कीडे से भी चलता रहता हैं।

दूसरा दीपक भी श्रेष्ठ गुरू की राह है। जैसै एक दीपक से अनन्त दीपक हम जला सकते है इसी प्रकार सच्चा गरू भी अपने शिष्य को इसी प्रकार की शिक्षा गुरू दक्षिणा में प्रदान करता है कि उनकी सिखाई हुई विद्या उनके शिष्य व शिष्य के भी शिष्य दीपक की तरह प्रकाशित करते रहें। गुरू की महिमा में संत कबीर लिखते है

गुरू गोविन्द दोऊ खडे़ काके लागू पाय। बलिहारी गुरूदेव की गोविंद दियो मिलाय।।

वैसे तो सभी कलाओं में व शास्त्रों में गुरू शिष्य परंपरा का ही महत्त्व है। चाहे तो वास्तु, मूर्ति, चित्र, काव्य व संगीत सभी क्यों न हों पर इन पांचों ललित कलाओं में भी संगीत कला का क्षेत्र व्यापक है। कारण की संगीत का मूलभूत आधार नाद है, जो आकाश का गुण होने से सर्वत्र व्यापक है। अन्य ललित कलाओं के मूलभूत आधार स्थूल पदार्थ हैं जो अल्प देश और काल तक सीमित रहते है। साथ ही अन्य ललित कलाओं का प्रभाव केवल चेतन मानव पर पडता हैं, किंतु संगीत कला का प्रभाव चेतन जगत व अचेतन जगत दोंनो पर पडता है।

संगीत के साथ एक कठिनाई है जो अन्य कलाओं में नहीं पाई जाती है। जहां अन्य कलाओं में केवल एक ही इकाई द्वारा असीमित, किन्तु सम्पूर्ण अभिव्यक्ति की जा सकती है, वहीं संगीत की एक इकाई से पूर्णाभिव्यक्ति असंभव है। संगीत में गुरू का महत्व इसलिए भी अधिक व श्रेष्ठ है कि प्रत्येक मानव के मन में संगीत की स्वर लहरियां विद्यमान है पर इन स्वर रूपी हृदय तंत्र में जब इनकी प्रगाढ़ता होती जाती है तो मानव मन अच्छे से अच्छा कलाकार भी बनना चाहता है। जब वह अपने रूझान को परिपक़्व करने के लिए अच्छे गुरू की तलाश में घूमता है। भारतीय इतिहास को देखने, पढ़ने व सुनने से पता लगता है कि हमारे आदर्श प्रभु मर्यादा पुरूषोतम श्री राम व श्री कृष्ण ने भी गुरू बनाये। अपना सम्पूर्ण जीवन गुरू की आज्ञानुसार ही चर्या करते हुए बिताया। हमारे सभी ऋषि महर्षियों ने कहा है – “नादाधीन जगत सर्वमं”  कहने का तात्पर्य है कि स्वयं न्यायेश्वर भगवान भी नाद के अधीन है।

गुरू शिष्य पद्धति में भी अन्य कलाओं से सर्वश्रेष्ठ कला है जो केवल संगीत को ही माना। क्योंकि संगीत कला ही एक ऐसी कला है जो व्यक्ति को तन्मयता प्रदान करती है। इसके उर्ध्वोन्मखी होने पर मनुष्य ईश्वर की और प्रवृत होता है। यही कारण था कि संगीत को विश्व के सभी धर्मों में विशिष्ट स्थान दिया गया। यह गुरूकृपा का ही सुफल है।

भारत में वैदिक युग से लेकर पौराणिक काल तक संगीत में गुरू शिष्य परम्परा विधि -विधान से चलती रही, जिसमें गुरू व आचार्य अपने शिष्यों को आर्यावृत की मर्यादायें सिखाते थे ।

कालांतर में गुरू-शिष्य पद्धति तो रही लेकिन उसमें बदलाव काफी आते गये। लोभ वृत्ति बढने लगी। संगीत विद्या जन-कल्याण की भावनाओं से परे होती गई। अब तो स्थिति ऐसी बदली है कि संगीत जैसी कला को सीखने से पहले माता-पिता ये पूछने लगते हैं कि इसमें कमाई कब होने लगेगी? आज का शिष्य भी यही सोचता है कि कमाई वाला संगीत आना चाहिए। बाबा तुलसी ने पहले ही कलयुग का भाव दरसाया हैं –

मात -पिता बालकन्हि बोलावहिं । उदर भरे सोई धर्म सिखावहिं ।।

आज सबका ध्येय केवल धन कमाना है। किसी विद्या में पारंगत हों या ना हों धन कमाने की पारंगतता को सच्ची कला समझा जाता है। हालांकि हमारे भारतीय संत, ऋषि, महर्षि, देव, गंधर्वादि इस पारंगतता को निरीमूर्खता ही मानते हैं। संत दादू-दयाल के शिष्य सुन्दरदास जी ने लिखा है –

तू कछु और विचारन है नर तेरो विचार धरयो ही रहेगो ।

कोटि उपाय करें धन के हित भाग  लिख्यो उतनोही मिलेगों।

समय ने फिर करवट बदली और जैन, बौद्ध, महाकाव्य काल, मोर्य, अशोक, कनिष्क एवं गुप्तकाल तक भी यह विधा चलती रही । आठवीं शताब्दी से बारहवी शताब्दी तक राजपूतों का राज्य रहा, फिर तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक मुगलों का व राजपूतों दोनों का राज्य रहा। सत्रहवीं शताब्दी से उन्नीसवीं शताब्दी तक अंग्रेजों का आधिपत्य रहा।

इन सभी संस्कृतियों का असर हमारे मानव जीवन पर अत्यधिक पड़ा। देश स्वतंत्र भले ही हो गया लेकिन विभिन्न संस्कृतियों के बलवती होने के कारण देश की मूल संस्कृति के साथ कुठाराघात होता रहा। इन संस्कृतियों के दुष्प्रभाव से भारतीय संगीत कला व गुरूजनों की मानसिक दशा भी दयनीय होती गई। हमारे यहाँ ऐसा मानना है, कि

“जैसा खावे अन्न वैसा होवे मन”

पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे

यही प्रभाव सभी कला-साधकों पर भी पड़ा। यदि कहें कि इन सब कारणों से गुरू-शिष्य परंपरा में भी बदलाव आया। जैसा कि कला-साधक अपनी कला को बांटना नहीं चाहते थे। केवल अपने परिवार के बच्चों को ही देना चाहते थे। या उनको दिया जिन्होंने तन, मन, धन गुरू के ही चरणों में समर्पित कर दिया। ऐसी विकट स्थिति में प्रातः स्मरणीय विष्णु नारायण भातखण्डे व विष्णु दिगम्बर पलुस्कर एवं साथ ही सभी संगीत पुजारी जिन्होंने संगीत शिक्षा देश की सभी स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में ऐच्छिक विषय के रूप में लागू करवाई। इस पुनीत कार्य के लिए पं. विष्णु नारायण भातखण्डे व पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर साथ ही वे संगीत साधक व कला रसिक अनंत साधुवाद के पात्र हैं जिनके अथक प्रयास से संगीत बचा रहा। भारतीय संगीत मनीषियों का व संतों का अकाट्य सिद्धांत रहा है कि संसार नाद के अधीन है। यह भी पूर्ण सत्य है कि संगीत व साहित्य ही भटकते हुए मानव को संस्कारवान व चरित्रवान बना सकता है अन्य विषय नहीं।

भारतीय कलाकारों ने इतनी साधना की है कि जैसे ही कोई कला- रसिक पं. भीमसेन का शास्त्रीय गायन सुनेगा तो कहेगा कि मैं भी ऐसा कलाकार होता। फिर वो सोचता है कि दुर्भाग्यवश मैं नहीं हुआ तो मेरी औलाद को अच्छा कलाकार बनाऊंगा। वर्तमान इस प्रकार के कला साधक है जिनकी वजह से भारतीय संगीत की मान -मर्यादा व रूझान बना हुआ है। जैसे पं. बिरजू महाराज (कथक नृत्य), पं. रविशंकर (सितार वादक), पं. जसराज (शास्त्रीय गायक), पं. हरिप्रसाद चौरसिया (बांसुरी वादक), उस्ताद जाकिर हुसैन (तबला वादक) आदि। यदि यह कहें कि इन सब कलासाधकों का व इन जैसे अनेकानेक कलाकारों का जीव केवल कला के लिए ही समर्पित है।

केवल संगीत क्षेत्र में अंधकार से प्रकाश की और ले जाने वाले हैं तो ऐसे ही गुरूजन व उस्ताद हैं जो शिष्य को सारगर्भित संगीत कला का मार्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि संगीत ही एक ऐसी कला है, जिसमें आज भी गुरू शिष्य परंपरा विद्यमान है। प्रश्न उठता है, कि संगीत मानव जीवन या जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक का साथी है। इसे सीखना क्या? इसका उपकार है कि सभी प्रकार से सुसज्जित नारी घूंघट में इतनी सुंन्दर लगती है कि प्रत्येक व्यक्ति देखना निहारना चाहेगा। जैसे ही उसका घूंघट उठता है उसके नासिका नहीं होती देखकर सभी व्यक्ति विस्मय की दृष्टि से देखने लगते है। इसका अर्थ हुआ कि संगीत प्रत्येक व्यक्ति के रग-रग में रचा-बसा तो है, लेकिन वो मनघडंत ही होता है। जैसे सब कुछ होते हुए भी नासिकाहीन औरत असुन्दर होती है। ऐसे ही वाणी में मधुरता होते हुए भी मनघडंत संगीत (गायन/वादन/नर्तन) को लक्ष्यहीन ही समझना चाहिए।

यदि संगीत कला को सलीके से सीखना है या व्यवसायोन्मूखी बनाना है तो गुरू की शरण में आना ही पड़ेगा।

आज के परिवेश में भी संगीत साधकों व संगीत के विद्यार्थियों को जो आर्थिक लाभ व सम्मान मिल रहा है उसमें गुरू के साथ-साथ कला रसिकों, कला-मर्मज्ञो, गुरूकुलों, शिक्षण संस्थाओं, संगीत की इज्जत करने वाले व्यवसाइयों द्वारा जो ऑडियो, विडियो कैसेट्स द्वारा जनता में प्रचार-प्रसार कर व सरकार के द्वारा भी काफी सहयोग दिया जा रहा है। जिसके कारण कला व कलाकार पुष्पवित पल्लवित हो रहें है।

शिक्षण संस्थाओं की सांगीतिक स्थिति

जहाँ तक संगीत में शिक्षण संस्थाओं का सवाल है तो यह कहा जा सकता है कि स्वातन्त्रोत्तर सभी क्षेत्रों व सभी कलाओं को जब लागू किया गया तो संगीत को भी जिसमें गायन, वादन, नृत्य आते हैं, को भी शिद्धत के साथ लागू किया गया। और तो और संगीत केवल स्कूलों व विश्वविद्यालयों में ही लागू नहीं किया गया वरन रेल विभाग, पोस्टल विभाग, बैंक, सैन्य, दूरभाष विभाग आदि में भी संगीत की नियुक्तियां कर संगीत को ससम्मान आगे बढाया और कलाकारों के जीवन स्तर को भी आगे बढाया। और तो और भारत के सभी बडे उद्यमियों ने भी अपने यहां संगीत को स्थान दिया। भारत सरकार ने कलाकारों के लिए आकाशवाणी केन्द्रों व दूरदर्शन केन्द्रों की भी स्थापना की।

इन दोनों प्रकार के केन्द्रों की (आकाशवाणी/दूरदर्शन) की स्थापना से देश व राज्य के सभी कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन के साथ-साथ आर्थिक सहयोग भी मिल रहा है। इन केन्द्रों में अनेक कलाकार सेवारत हैं। यदि यह कहा जाये कि जो कार्य राजा-महाराजा व नवाब पुराने समय में संगीत के साधकों के लिए करते थे वही कार्य देश आजाद होने के बाद में केन्द्र व राज्य सरकारों ने किया। जिसकी वजह से भारतीय संगीत की प्रत्येक विधा जीवंत है।

हमें सरकार व संगीत कला को अथक प्रयासों से चलाने वाले सभी गुरूकुलों का व संस्थाओं व्यापारियों का जो कि ऑडियो, विडियो व कैसेटस के द्वारा प्रचार -प्रसार में लगे हुए हैं, का ऋणि रहना होगा। अन्यथा विदेशी संस्कृतियों के कारण हमारा सांगीतिक वातावरण पहले भी दुषित हो गया था, व अब भी पुनः पाश्चात्य संस्कृती प्रभावी हो रही है। व देश की धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक व सांगीतिक गतिविधियों को प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड रखी है। यदि यह कहा जाये कि वर्तमान समय में सरकारी तंत्र व निजी शिक्षण संस्थाओं के सहयोग से भारतीय संस्कृति बची हुई है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं।

विषयान्तर्गत दोनों पद्धतियों के गुणावगुण पर भी एक नजर डालनी चाहिए ।

गुरू -शिष्य पद्धति के गुण

  1. वर्तमान समय में भी कुछेक संगीत गुरू अपने शिष्यों को औलाद के समान मानते हुए संगीत का ज्ञान प्रदान करते हैं  ।
  2. गुरू अपने शिष्यों को घर भी इल्म देते हैं ।
  3. गुरू अपने शिष्यों को सिखाते समय सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर ज्ञान देते है ।
  4. गुरू किसी भी शिष्य को आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं देखता उसकी नजर में केवल प्रतिभावान होना आवश्यक है, धनाड्य होना नहीं ।
  5. गुरू अपने शिष्यों को केवल व्यवसायोन्मुखी ही नहीं बनाते वरन संस्कारोन्मुखी भी बनाते हैं ।
  6. गुरू अपने शिष्यों को यह भी शिक्षा देते  हैं कि समाज में रहते हुए छोटे-बडे का सम्मान कैसे किया जाये।
  7. गुरू अपने शिष्यों को संगीत में तीनों (गायन, वादन, नृत्य) विधाओं का सम्मान करना सिखाते है।
  8. गुरू- शिष्य पद्धति ही एक ऐसी पद्धति हैं जहां संगीत को साधना के रूप में कई वर्षों तक सिखाया जाता है। तभी तो कहा है  – “एके साधे सब सधे सब साधे सब जाय”।
  9. गुरू-शिष्य पद्धति में संगीत के साथ-साथ काव्य कला भी सिखाई जाती है।
  10. गुरू-शिष्य पद्धति में ही आत्मा से परमात्मा का मिलन  कैसे हो, यह भी सिखाया जाता है।

गुरू -शिष्य परंपरा में दोष

  • वर्तमान में गुरू-शिष्य परंपरा के मायने (अर्थ) ही बदल गये हैं।
  • गुरू अपने शिष्य को संगीत की गूढ साधना तक नहीं पहुंचाता है। उसकी इच्छानुसार सिखाता हैं।
  • गुरू अपने ईद -गिर्द शिष्यों की भीड़ चाहते हैं। जो एक प्रदर्शन का रूप हैं।
  • सभी गुरूजन अपने-अपने स्तर से संगीत (सामवेद) का मुल्यांकन करने लगे हैं।
  • तुच्छ लोभ के कारण संगीत को समय सीमा में बांध दिया गया है।
  • संगीत-साधकों का फकीरी भाव भौतिकवादी अग्नि में स्वाहा होता जा रहा है।
  • संगीत का व्यवसायीकरण होने से व्यक्ति-व्यक्ति के व्यवहार में प्रतिकूल असर पडा है।
  • अधिकतर गुरूजन केवल स्वयं की ही प्रशंसा करते हैं धीरे -धीरे वही गुण शिष्य में आते हैं।  जिसके कारण इर्ष्या-द्वेष को बढावा मिलता है ।
  • लोभवृति के कारण गुरूजन धनाढ्य लोगों को भी सिखाने लगे हैं, जो संगीत का शौक तो रखते हैं पर  संगीत के मर्म को नहीं जानना चाहते।
  • गुरूजनों में मादक पदार्थो का सेवन अधिक होने लगा है जिसका दुष्परिणाम शिष्यों को भी भोगना पडता है।
  • कुछेक गुरूजन चरित्र की कसौटी पर खरे नहीं उतरते जिस कारण संगीत के विद्यार्थियों मे कमी हुई है।
  • गुरूजनों का सांगातिक शिक्षण मानदेय उस प्रतिभावान विद्यार्थी के लिए दुर्लभ हो गया जो आर्थिक-दृष्टि से कमजोर है।
  • स्वयं गुरूजनों में धैर्य की कमी हो गयी है। शिष्य को समय से पहले ही मंच दिलवाने में उत्सुक रहते हैं।
  •  गुरूजन संगीत को भक्ति साधना नहीं मानकर उदर पूर्ति का साधन मानने लगे हैं।

संस्थागत शिक्षण पद्धति के गुण

  1. स्वतंत्रता के बाद देश की शिक्षण संस्थाओं में संगीत को ऐच्छिक विषय के रूप में रखा गया।
  2. संगीत विषय को प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालयीन स्तर तक लागू किया।
  3. संगीत में पी एच डी लिट,नेट व स्लेट और एम फिल आदि भी होने लगे।
  4. शिक्षण संस्थाओं में स्थित पुस्तकालयों द्वारा संगीत के शास्त्र पढने से विद्यार्थी का शास्त्र ज्ञान बढा हैं।
  5. शिक्षण संस्थानों में संगीत का प्रायोगिक ज्ञान सरलता से प्राप्त होने लगा।
  6. शिक्षण संस्थाओं के द्वारा धनहीन असहाय प्रतिभावान विद्यार्थी को छात्रवृत्ति दी जाती है।
  7. शिक्षण संस्थाओं के कारण ही सभी वर्ग के विद्यार्थियों को संगीत शिक्षा  मिलने लगी।

संस्थागत शिक्षण पद्धति के  दोष

  1. शिक्षण संस्थाओं में संगीत विषय को जिस मौलिकता व गुणवता के साथ लागू किया गया था, उतनी कारगर नहीं हुई।
  2. शिक्षण संस्थाओं में अधिकांश डिग्रीधारी कलाकार नियुक्ती पाने लगे जिससे संगीत का प्रायोगिक पक्ष कमजोर होता गया।
  3. शिक्षण संस्थाओं में शिक्षक व विद्यार्थी का अधिक सामिप्य (मित्र भाव या बराबर का भाव) बढने लगा। जिससे श्रद्धाभाव देखा देखी का होता गया।
  4. शिक्षण संस्थाओं में साधनारूपी कला को व अध्ययन से प्राप्त होने वाले विषयों को समदृष्टि से ही देखते हैं।
  5. संस्थाओं में साधनारत कलाकारों की नियुक्ति न के बराबर होने के कारण विद्यार्थीयों की संख्या में कमी होने लगी है।
  6. शैक्षणिक संस्थाओं में सीखने वाले संगीत विद्यार्थी जन-मानस पर संगीत (गायन, वादन, नृत्य) का असर छोडने में अधिकतर असफल ही रहते हैं।
  7. सरकारी नीतियों के अनुसार शिक्षण संस्थाओं में संगीत के लिए भी जातिगत व्यवस्था  की गई हैं। जबकी वीर की व धर्म की कोई जाति नहीं होती।
  8. शिक्षण संस्थाओं में संगीत, साहित्य व कला विहीन अधिकारियों को व्यवस्थापक बना दिया जाता है।
  9. शिक्षण संस्थाओं के शिक्षक गण अधिकतर संगीत के स्तरहीन सरकारी आयोजनों में  मशगूल  रहते हैं या सभाओं में समय बर्बाद होता रहता है।
  10. शिक्षण संस्थाओं में उदण्डी विद्यार्थियों एवं विभागीय कार्यकर्ताओं की वजह से आये दिन नारेबाजी व हडतालादि होती रहती है।
  11. शिक्षण संस्थाओं के गुरूजनों की कृपा से कुछेक चाटुकार विद्यार्थी अधिक अंक लाने में सफल होते हैं। तो प्रतिभावान विद्यार्थी भी संगीत की साधना को छोडकर चाटुकारिता की साधना में लग जाता है।
  12. शिक्षण संस्थाओं के संगीत पाठयक्रम में कोई फेर बदल नहीं हो रहा हैं, जिस कारण विद्यार्थी आलसी हो जाता है। कुछ परिवर्तन हुए भी हैं तो उन्हें संतोषप्रद नहीं कहा जा सकता।
  13. शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा लगभग समाप्त हो गई है जिससे भारतीय संस्कारों  का सूर्य अस्त होता  जा रहा है।

निष्कर्ष:

इन दोनों प्रणालियों का सिंहावलोकन करते हैं तो पाते हैं, कि दोनों ही प्रणालियों में परेशानी सीखने वाले को ही हैं। जहाँ तक गुरू-शिष्य परंपरा की बात है, तो कहेंगे कि अब प्रभू श्री राम – श्री कृष्ण का समय नहीं रहा। अब आर्थिक युग आ गया। आज का विद्यार्थी संगीत कला हो या और कोई कला हो धन कमाने की भावना से ही सीखता हैं। उसकी साधना का मुख्य उद्देश्य ऐन-केन प्रकारेण धन कमाने का है कुछ हद तक यह बात ठीक भी है संगीत के साधक अर्थाभाव से ग्रसित रहते है। इसलिए साधना के साथ-साथ अर्थ का प्रयोजन भी सिद्ध होता रहे तो अच्छा ही है। अतः गुरूजनों को शिष्य की दशा व समयानुकूल परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए सामंजस्य कर लेना चाहिए। बडी कृपा होगी। ऐसा करने से गुरूजनों की संगीत विद्या फूलेगी -फलेगी। माना कि इस तरह से संगीत ऊॅचाइयों को भले ही न छू सकेगा पर जन -मानस पर अंकित अवश्य रहेगा। ऐसा नहीं करने से सम्पूर्ण समाज में स्तरहीन (कूड) कलाकारों का वर्चस्व होता जायेगा। कालांतर में शास्त्रीय संगीत की व मार्मिक साहित्य की अर्थी निकलती नजर आयेगी। कुछ समय बाद अच्छे लोग मूक दर्शक बन देखते रहेगे कर कुछ नहीं सकेंगे। अतः सभी गुरू-जनों को भारतीय संगीत व साहित्य को अपना धर्म व कर्म समझते हुए बचाव करने की भरसक कोशिश करनी चाहिए। ताकि संगीत का भविष्य उज्जवल रहे। ऐसा नहीं करेंगे तो हमारी भावी पीढीयां सभी गुरू-जनों को कोसती रहेंगी व बद्दुआ देती रहेंगी। किसी शायर ने कहा है

मैं जानता हूँ असर तुम्हारी जुबा पे है, दुआ लगे न लगे बद्दुआ जरूर लगती है।

तुलसी दास जी ने रामायण में भी लिखा है कि- “अलप लोभ भल कहहू न कोऊ” अतः सभी गुरूजनों को लोभ त्याग संगीत सेवा में लगना है व आने शिष्यों को भी यही शिक्षा दें कि साधना व भक्ति करों धन अपने आप आयेगा। कहा है – “मिनख मजूरी देत है, क्यों कर राखे राम”

तुलसीदास कहते है कि –

हाथी कदेन हल हांके सिंह व्योपार न करई।

अजगर करे न काम भूख पंछी नहीं मरई।।

थावर जंगम जीव जड़ तिनके कारज अति सरे।

तुलसीदास विस्वास बिनु मूरख नर पग पग मरे।।

उपरोक्त महात्माओं की बात सभी साधकों व साधनारत विद्यार्थियों को दृढ़ता से दिल में जम गई तो संगीत की व देश की सच्ची सेवा होगी। आपके हमारे इस दृढ़ विश्वास से भावी पीढ़िया आध्यात्म से भी तादात्म्य रखेगी।

जहाँ तक शिक्षण संस्थाओं के संगीत अध्यापकों/प्राध्यापकों का प्रश्न है तो यह है कि मनमें कोई कटुभाव नहीं रखते हुए अपना कार्य ईमानदारी से करें। संगीत साधकों को ससम्मान संस्थाओं में बुलावें व संगीत विद्यार्थियों को  कला का लाभ प्राप्त करावें। सभी विद्यार्थीयों के प्रति समान भाव रखें। ताकि यह संगीत की पवित्रता ज्यों कि त्यों बनी रहे। चन्द संगीत शास्त्र पढ लेने से वे विद्वान नहीं होते। इस तरह के भाव से अहम् झलकता है, जबकि विद्या विनयशीलता सीखाती है। अपने कार्य में भूख होनी चाहिए। भूखे के लिए कहा है -“भूखस्यसि किम न करोति पापम्” कहने का तात्पर्य है सभी शिक्षकों व शिक्षिकाओं को सीखाने की भूख होनी चाहिए यदि इन सभी बातो को सभी संगीत कार्यकर्ता गहनात से मन में बिठालें तो संगीत की व देश की सच्ची सेवा होगी।

सुझाव –

  1. शिक्षण संस्थाओं में दोनों प्रकार (कलाकार व शास्त्रकार) के ज्ञाताओं की नियुक्ति होनी चाहिए।
  2. संगीत की शिक्षा प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालयीन स्तर तक आवश्यक रूप से लागू होनी चाहिए। संस्थाऐं सरकारी हों या निजी हों।
  3. संगीत कला से साक्षात्कार में संगीत के शास्त्रकार व कलाकार ही हों। अन्य का दखल न हों।
  4. शिक्षण संस्थाएँ संगीत से अर्थ प्राप्ति का भाव न रखें। बल्कि इस विद्या को कैसे बचाया जाये यह भाव होना चाहिए।

इसे इस तरह मानना चाहिए कि संगीत धर्म से जुड़ा हुआ है। और धर्म पंगु होता है। पंगु का मतलब लंगड़ा। लंगड़े को पकड़कर चलाया जाता है या बैसाखी से चलता है। ऐसे ही संगीत को पंगु समझ के चलाया जाना चाहिए।

संगीत से यदि कोई संस्था यह समझे कि इससे आर्थिक लाभ नहीं है अतः हम पाठ्यक्रम में लागू नहीं करेंगे। मैं कहूंगा कि वह संस्था भारतीय हो ही नहीं सकती है।

यह अकाट्य सत्य है कि वर्तमान में जितने भी अमानवीय कृत्य हो रहे है इन सबकों रोकने में व सही दिशा देने में भारतीय शास्त्रीय-संगीत व सभ्य लोक-संगीत इतना कारगार हो सकता है, जितना सरकारी प्रशासन भी नहीं हो सकता।

अतः सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव करते हुए भारतीय संस्कृति को धर्म को व समाज को बचाये रखें जाने में स्पष्ट नीति अपनाकर हमारी समस्त कलाओं का व समस्त देश का भला करें।

-जयहिन्द


लेखक:

पंडित हनुमान सहाय हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता है। वे संगीत में डॉक्टरेट है तथा वनस्थली विद्यापीठ में २० वर्षों तक संगीत के शिक्षक रहे है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से सीनियर फेलोशिप प्राप्त पं.सहाय “विचार राग सागर” तथा “मरुधरा के भक्त कवी गायक” पुस्तकों के लेखक भी है।

अस्वीकरण – लेख में दिए गए विचार लेखक के अपने हैं, उस पर सम्पादक या प्रकाशक की सहमती हो यह आवश्यक नहीं है |

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